Saturday, November 16, 2013

FUN-MAZA-MASTI शुभारम्भ-14

FUN-MAZA-MASTI

शुभारम्भ-14

 उसने व्हाइट टी शर्ट पहनी थी और उसके नीचे सोफ्ट सा पजामा. जहाँ टी शर्ट ख़तम होती थी और जहा से पजामा शुरू होता था उसके बीच थोड़ी सी जगह थी जहाँ से उसकी संगमरमर जैसे कमर दिख रही थी. वो जैसे ही झुकती, दीदार हो जाता. मैं बैठा बैठा आनंद ले रहा था. उसने अचानक मुझे ताड़ते हुए देख लिया और मैं सकपका कर इधर उधर देखने लगा. वो मुझे देखने लगी और कुछ सोचने लगी. अचानक वो बोली, " शील, तुमसे कुछ पुछु ? बुरा तो नहीं मानोगे ?". मैंने कहा पूछो ना.

वो पूछ पड़ी "तुम्हारी हेल्थ-हाईट अच्छी है, दिखने में बुरे नहीं हो, तुम में तमीज़ है.......तुम ये हकलाने की बीमारी का इलाज क्यों नहीं कराते ?" मैंने ठंडी सांस ली और कहा, " पिया, दरअसल डॉक्टर का कहना है की मेरे गले में कोई दिक्कत नहीं है, मैं सिर्फ गुस्से में या नर्वस होने पर ही हकलाता हूँ" . "हम्म........गुस्से का तो समझ आया......मगर तुम नर्वस कब होते हो ? "
उसने पुछा. मैंने उसे बताया, "जब कोई गलती कर दू या कोई लड़की मुझसे बात कर रही हो या......."

"या मतलब क्या ? मैं तो तुमसे बात कर रही हूँ तो क्या मैं लड़की नहीं हूँ ? ", उसने माथे पर सल लाके पुछा .

यह कहकर उसने मेरे जांघ पर अपने हाथ रख दिया और सीधा मेरी आँखों में देखकर बोली, " ऐसे होते तो क्या नर्वस ?"
यह सुनकर मेरा लंड नींद में से जगा और उसने अपना पूरा फन फैला लिया. मुझे दिक्कत होने लगी मगर पिया का हाथ इतना गरम आनंद दे रहा था की हिलने की इच्छा भी नहीं हो रही थी. ज्यादा प्रोब्लम हुयी तो मैं एकदम हिला और अपने लंड को
एडजस्ट किया. पिया की निगाहे मेरे लंड पे टिक गयी और उसने मेरी पेंट के उभर की तरफ इशारा करके पुछा, " नर्वस होते हो तो ऐसा भी होता है क्या ?" कसम से इच्छा हुयी की इस को यहीं पटक कर अपना लंड पेल दू, मैंने उसकी तरफ हाथ बढाया और तभी किसी ने दरवाजा जोर से खटखटाया.
 नवजोत की आवाज़ आई, "पिया.....दरवाजा खोल". पिया का चेहरा एकदम तमतमा गया, वो उठी और पैर पटकती हुयी दरवाजे पर गयी. उसने जोर से दरवाजा खोला, "क्या है भाई ?, आप तो पढ़ते नहीं मुझे तो पढने दो."

नवजोत ने कहा, "हाँ हाँ ...पढ़ ले...,.मैं तो तेरे माट साब से नमस्ते करने आया हूँ. नमस्ते माट साब."

मेरी गांड की फटफटी चल निकली थी. साला मादर चोद.....इसको अभी ही आना था. मैंने कुछ नहीं कहा और घडी देखते हुए उठा और पिया से कहा, "अच्छा मैं चलता हूँ, आप रिवायिस कर लेना."

नीचे आया तो पम्मी आंटी बैठी थी, वो बोली, "जा रहे हो शील, (बेटा लगाना भूल गयी). ध्यान रखना पिया का. अकाउंट में बहुत वीक हैं. कल भी ६ बजे ही आओगे ? " मैंने हाँ कहा और चुप चाप सुमड़ी में निकाल लिया. अचानक पीछे से आवाज़ आई,
" ओये हकले......अबे रुक.....", साला सांड मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा.

मैं रुक गया. नवजोत आया और मुझे घूरने लगा.......मैं उस से नज़रे नहीं मिला रहा था.....उसने कहा ," देख बेटा, पढ़ाने आता है, सिर्फ पढ़ाइयो......कुछ इधर उधर किया तो समझ लियो ....."

मैं हाँ हूँ बुदबुदाते हुए चुप चाप निकाल लिया.

 इधर उधर घूम कर घर पहुंचा तो 11 बज गए थे. चाची बैठी बैठी टीवी देख रही थी. मुझे देखकर बोली,

"आ गया लल्ला....चल खाना खा ले.". मेरा सर भारी हो रहा था मैंने मना कर दिया. वो उठ कर मेरे पास आई, "क्या हुआ लल्ला, तबियत ठीक नहीं क्या ? ". मैंने कहा, "चाची सर भारी हो रहा है". वो बोली, "चल सर में तेल मालिश कर दूँ. मैंने मना कर दिया और उनको कहा की वो सो जाए.

तो वो बोली," क्या सो जाऊं लल्ला, आज ३ ट्रक माल आया है, तेरे चाचा खाली करवा कर आयेंगे. फिर उनको खाना देने उठना पड़ेगा और तुझे पता है की मैं एक बार सो गयी तो बम फूट जाये तो भी नहीं उठती. चल तू इधर आ"

कहकर उन्होंने मुझे बैठा दिया. वो सोफे पर बैठी थी और मैं उनके आगे ज़मीं पर. उन्होंने अपने दोनों पेरों को थोडा थोडा खोल कर फैला लिया और मुझे पीछे खिंच कर बैठा लीया. वो ठंडा तेल लगा रही थी, उनके नर्म नर्म उंगलियों से छुने से ही मेरा सर हल्का होने लगा. वो टीवी भी देख रही थी. गोविंदा की मूवी आ रही थी जो उनका फेवरेट हीरो था. अचानक एक कॉमेडी का सीन आया और चाची जोर जोर से हंसने लगी. हँसते हँसते वो आगे झुक गयी और उनके दोनों मम्मे मेरे सर से टकराने लगे.
लंड तुरंत खड़ा हो गया. मैंने थोडा सर घुमाया तो छोटे से ब्लाउस में फंसे बेचारे मम्मे उन्हें बाहर निकालने की फरियाद कर रहे थे. चाची के सोफ्ट मम्मे मेरे मुंह से सिर्फ कुछ इंच दूर थे. लंड ऐसा तना की लगा पैंट में ही छेद कर देगा.चाची ने अपनी टांगो से भी मुझे जकड लिया था. मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला.

कीड़ा........कुलबुलाने लगा.

 मैंने समझ गया की चाचा २-३ घंटे नहीं आएगा और माँ - पापा तो कब के सो चुके होंगे . मैंने चाची से पुछा.

"चाची वो.......आप की खुजली अब ठीक है ?"

एक सेकंड में चाची के हाव भाव बदल गए. उन्होंने एक पल मुझे टेडी नज़र से देखा और फिर बोली,

" नहीं रे लल्ला, थोडा तो आराम है मगर अभी भी हो जाती है. देख ना तुने याद दिला दिया और शुरू हो गयी".

उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी के ऊपर से अपनी मुनिया को खुजाना शुरू कर दिया. वो बिंदास मेरी आँखों में ऑंखें डाल कर अपनी चूत खुजाले जा रही थी. मेरा सांप ऐसा लहराने लगा जैसे कोई सपेरा बीन बजा रहा हो. मैंने पुछा,

"चाची.....आप पेंटी तो नहीं पहन रही हो ना ?". चाची से एक ठंडी सांस ली, अपने मम्मे और उभारे और बोली, "अरे लल्ला....पेंटी तो कब से ही नहीं पहनी. दिन भर ऐसे ही घुमती हूँ......कभी हवा तेज़ चलती है ना तो वहां तक झोंके आते है"

चाची की ऐसी बातें सुन सुन कर लंड लार टपकाने लगा. मैंने झोंक झोंक में उनसे पुछा....

"चाची, मैं आपको बोलना भूल गया वो दवाई वाले ने ये भी कहा था की ये दवा बाल साफ़ कर के लगानी है, पर आप ने तो साफ़ किये ही नहीं"

ये बोलते ही चाची ने एक दम पलट के मुझे देखा. एक सेकंड तो वो मुझे देखती रही और फिर उन्होंने पुछा...

"क्यों रे लल्ला....तुझे क्या पता की मैंने...........वहां के बाल साफ़ नहीं किये"

मेरी गांड की फटफटी फिर चल निकली.

 मुझे काटो तो खून नहीं. मेरा दिल सीने से उतर के गांड में चला गया था. जैसे दिल धड़कता है वैसे मेरी गांड धड़क रही थी. शायद इसी को गांड फटना कहते हैं.
चाची ने आज मुझे दूसरी बार रंगे हाथों पकड़ लिया था. मैंने कुछ नहीं कहा और सर नीचे कर लिया.

चाची ने मेरे यह हाव भाव देखे तो आवाज कड़क कर के बोली, "बोल लल्ला, तुझे क्या पता की मैंने बाल साफ़ नहीं किये"

मैंने चाची को घुमाने के लिए बोल दिया, "न न न नहीं च च च चाची.....व व वो ....म म म मैं ......म म मैंने ऐसे ही बोल दिया"

उन्होंने फिर से कड़क आवाज़ में पूछा,"बताता हैं की मैं........तेरे चाचा को बोल दूँ"

भाई साहब अपनी तो सांस ही रुक गयी.......सारी गांड मस्ती निकल गयी. मैं चूतिये जैसे मुंह नीचे कर के खड़ा था और वो मेरे सामने अपने दोनों हाथ कमर पर रख कर खड़ी थी. जैसे कोई दरोगा किसी चोर को चोरी करते पकड़ ले. मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था. उन्होंने फिर पूछा,

"बता लल्ला......कहीं तू मेरे कमरे और बाथरूम में ताक झांक तो नहीं करता ? अरे कहीं तू हिरसू तो नहीं है रे ???"

"न न नहीं च च चाची.......म म मैं ताक झांक नहीं करता. वो आज सुबह टंकी में था न......ज ज जब आप टंकी के ऊपर दोनों टाँगें चौड़ी कर के खड़ी थी........तो दिख गया था........मम्मी की कसम चाची......मैं ताक झांक नहीं करता. प प प प्लीज़ आ आ आ आप किसी को म म म मत बोलना.....", मैं रुवांसा हो गया.

उस कमीनी ने फिर पलटा खाया और धीरे धीरे मुस्कुराने लगी.......बोली,

" हाय राम......ये मरी खुजली......न ये होती.....न मैं ऐसी नंगी घुमती......न मेरी फूल कुंवर ज़माने को दिखती"

सीन चेंज हो गया था. चाची के मुंह से उनकी चुत का नाम सुन के मेरे लौड़े ने तुरंत सलामी दी. मैंने हिम्मत की......

"च च चाची.....आप चिंता मत करो. ज़माने ने थोड़ी ही देखा, वो तो मुझे दिख गयी गलती से....."

"अरे लल्ला मैं सब जानती हूँ, मैं तभी सोची थी की ये लल्ला टोर्च की रौशनी मेरी साड़ी में क्यों मार रहा है", चाची ने आखें तरेर के कहा.
"और तभी तू टंकी से बाहर नहीं आ रहा था, क्योकि ये खड़ा हो गया था." वो मेरे लंड की तरफ इशारा कर के बोली.

मैंने भी ढीली बाल देख के बल्ला घुमाया, "अब चाची इसमें इसका क्या दोष, बेचारे को इसकी साथीन दिखी तो यह खड़ा हो गया, हाल चाल पूछने के लिए"

चाची ने वो तिरछी नज़र मारी की दिल से लेकर मेरे गोटों तक सनसनी मच गयी.

 चाची मंद मंद मुस्कुराते हुए देख रही थी. बड़ी अदा से इतरा कर बोली, " हाय राम....लल्ला......बहुत बदमाश हो गया है, तेरे लिए तो लड़की मैं ही ढूंढ़ कर लाऊंगी"

मैंने ने कहा, "हाँ चाची, अपने जैसी ही ढूंढ़ कर लाना", बेचारी का एकदम से चेहरा उतर गया. ठंडी सांस लेकर बोली, " मेरे जैसी ला कर क्या करेगा लल्ला, न मैं तेरे चाचा को बच्चा दे पाई ना तेरी माँ जैसा खूब दहेज़ लायी, मुझे तो लगता है की तेरे चाचा भी मुझसे प्यार नहीं करते......ऐसी लड़की का क्या करेगा रे...."

माहोल एक दम बदल गया. उनका चेहरा ही उतर गया था. अचानक मेरे मन में इस दुखियारी के लिए दया आ गयी. मैंने उनको खुश करने के लिए कहा,

" नहीं चाची, आप जैसी ही लाना, इतना सब होने के बाद भी आप कितनी हंसमुख हो, घर के सारे काम संभालती हो, आपके यहाँ आने के बाद से माँ को तो बस मंदिर दीखता है मगर आप फिर भी उनको इतनी इज्ज्ज़त देती हो..... चाचा अगर आपका ख्याल नही रखता और अगर बच्चा ना हुआ तो इसमें आपका क्या दोष ?
खराबी तो चाचा में है." वो एकदम आँखों गोल करके बोली, " क्या बोल रहा है रे लल्ला...." . मैंने और हिम्मत करते हुए कहा, " मुझे पता है की चाचा में शुक्राणु की कमी है, वो रिपोर्ट मैंने पढ़ ली थी"

चाची ने एक ठंडी गहरी सांस ली......उनका ब्लाउस ऐसा तना की लगा आज सारे हुक टूट जायेंगे. फिर बोली, " इसीलिए कहती हूँ लल्ला कि बुरी आदतों से दूर रह, कल तेरी बीवी को भी येही दुःख भोगना पड़ेगा. ना मन में शांति रहेगी ना ....तन में."

मैंने बात काटी, "नहीं चाची ऐसा नहीं हैं, मैं भी कोई रोज़ रोज़ नहीं करता, वो तो आजकल... , और वैसे भी डाक्टर चाचा ने बताया हैं कि कभी कभी करने से कुछ नहीं होता."

"आज कल क्या रे लल्ला......", चाची ने ऑंखें सिकोड़ के पूछा. मैंने हिम्मत जुटाई और पाँसा फेका, "न न न नहीं क क कुछ नहीं..... "

चाची ने आवाज़ कड़क कर के बोला, "बता ना ....आज कल क्या ? "

"वो च च चाची .....आप मजाक करती हो ना...तो मुझे करना पड़ता है"

"हाय राम......बेशरम. तो तू क्या मेरे बारे में सोच सोच कर........हाय राम....उठ यहाँ से.........खड़ा हो जा "

मेरी गांड फटी......"न न नहीं च च चाची.....म म मेरा मतलब है कि मुझे सपने आते है अजीब से......और वो सोचने से ये ऐसा हो जाता हैं, इ इ इस लिए करना पड़ता है"

चाची मुझे घुर रही थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करू ? फिर वो बोली, "देख लल्ला....मैं तुझ से बड़ी हु....तेरी चाची हूँ, ये गन्दा गन्दा मत सोचा कर, मैं तो समझ भी जाउंगी कि तू अभी बच्चा है मगर दुनिया क्या कहेगी....."

साली को ये दिक्कत नहीं कि मैं उसके बारे में सोच सोच कर लंड हिलाता हूँ, उसकी तो इज्ज्ज़त के नाम फटी है. मैंने कहा, " चाची मैं कभी किसी से कुछ नहीं बोलूँगा,
माँ की कसम, आप ही तो है घर में जो मुझको समझती है, बात करती हैं, इतना ध्यान रखती हैं, माँ को तो भगवान् और भजन से फुर्सत नहीं और पापा को तो ये भी नहीं पता होगा की मैं कौन सी क्लास में और कौन से कॉलेज में हूँ. चाचा तो यूँही काम में इतना बिजी रहते हैं.

इतनी भारी सेंटी मारी की चाची एकदम पसीज गयी और बोली, "नहीं रे लल्ला.....ऐसा मत बोल रे ...मैं हूँ ना.....तेरा पूरा ख्याल रखूंगी......तेरा मेरा दर्द एक जैसा ही है रे......" कह कर उन्होंने मुझे गले लगा लिया. उनकी हाईट तो कम थी मगर वो बैठी थी सोफे पर और मैं था निचे. मेरा सर सीधा उनके मम्मो के तकिये पर टिका.

एक पसीने और साबुन की खुशबु का मिला जुला झोंका मेरी नाक में आया और मेरा लंड जो उनके पैरों से चिपका था, सर उठाने लगा.

 मैं उस गद्देदार तकिये के मज़े ले रहा था, ऐसा लग रहा था की बस यहीं पर समय रुक जाये. चाची ने मुझे धीरे से पीछे किया, और बोली, " लल्ला....तेरी लुगाई बहुत खुश रहेगी रे....तू अब समझदार हो गया हैं. तभी मैंने कहा, "और जवान भी". हम दोनों हंसने लगे.....तभी उनकी नज़र मेरी पेंट के उभर पर गयी जहाँ पर मेरा बाबुराव कसमसा रहा था. मुंह पर हाथ रख पर बोली," राम राम .....लड़का है की सांड है रे ?"

मैंने अनजान बनकर पूछा, "क्यों चाची, सांड क्यों ?"

चाची ने अपना निचला होंट मुंह में दबाया और बोली, "क्योकि सांड भी ऐसे ही होते हैं" . मैंने फिर कुरेदा, " मैं समझा नहीं"

"अरे लल्ला.....वो गाँव में अपने घर एक सांड पाला था.....6 -7 फुट ऊँचा और ऐसा भारी था की 100 गाँव तक उसकी बातें होती थी, वो तेरे चाचा ने उसको गाय गाभिन करने के काम पर ही लगा दिया था, लोग अपनी अपनी गाये लाते, गाय को स्टैंड में खड़ा करते और अपने सांड को उसके पीछे खड़ा कर के कुलहो पर एक लट्ठ मारते.
लठ खाते ही उसका ........वो....... तलवार जैसे बाहर निकलता और वो गाय पर चढ़ जाता. ऐसे वो एक दिन में 6 -7 बार कर लेता था. गाय गाभिन हो जाती, किसानों को अच्छे नस्ल के बछड़े मिल जाते और तेरे चाचा को हर बार के 500 रूपये. तेरे चाचा उस सांड से ही कुछ सीख लेते........"

चाची की आँखों में लाल लाल डोरे दिखने लगे थे, शायद सांड के तलवार जैसे लंड की याद आ गयी थी. मैंने कल्पना की की चाची घोड़ी बनी हुयी हैं और पीछे से मैं उनकी मार रहा हूँ . शायद इसलिए चाची मुझे सांड बोल रही थी.......

मतलब क्या चाची ...................

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