Saturday, November 16, 2013

FUN-MAZA-MASTI शुभारम्भ-29

FUN-MAZA-MASTI

शुभारम्भ-29

 चाची बाबुराव को ऐसे देख रही थी जैसे बिल्ली मलाई को देखती है.

चाची ढिठाई से बोली, "राम.....अंदर कैसे नहीं होगा......ठहर......टांगे फैला तो"

चाची बाबुराव को खुद.....अपने हाथ से............... अंडरवियर में डालने वाली थी.
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चाची ढिठाई से बोली, "राम.....अंदर कैसे नहीं होगा......ठहर......टांगे फैला तो"

यह सुनकर ही हरामी बाबुराव ने जो ठुनकी मारी है की क्या बताऊ ? चाची ने अपने दोनों हाथ मेरे घुटनों पर रखे और दरवाजे की तरह मेरी टांगे खोल दी. चाची का पल्लू तो गिर हुआ था ही.....उनके मम्मे छलक
छलक के बाहर आ रहे थे.....भेन्चोद इतना छोटा ब्लाउस पहनती है की ब्रा की तो जरुरत ही नहीं.

मेरी भूखी निगाहें चाची के मम्मो पर चिपकी हुयी थी......बस में बंगाली मैडम को देख कर पहले से ही माहोल बना हुआ था........चाची ने बाबुराव का अंडरवियर के ऊपर से मुआयना किया और बोली,

"अरे....लल्ला.......ये मरे सफ़ेद कच्चे क्यों पहनता है रे........इतने छोटे छोटे से है......दाग धब्बे भी जल्दी दीखते है"

मैं सकपकाया, " च...च....चाची यह तो जोकी की अंडरवियर है........."

चाची ने ऑंखें नचाई, " होगी मरी....जाकी फाकी.....सबसे बढ़िया तो तेरे चाचा की है......अमूल की लम्बी अंडरवियर.......भूरे नीले काले रंग की.....न दाग दिखे न धब्बे.......और उसमे से यह ऐसे दीखता भी नहीं", कहकर उन्होंने मेरे बाबुराव को सहला दिया.

ऐसा लगा किसी ने मेरे बाबुराव पर बिजली का नंगा तार छु दिया हो. मैं उछल पड़ा .....चाची ने ऐसे जताया मानो कुछ न हुआ हो.....वो भोली भली बनकर मेरी आँखों में देख रही थी......मगर उस हरामन का हाथ मेरी जांघ पर धीरे धीरे से सहला रहा था.

मेरे मन में तो आ रहा था की चाची को यही पटक के साड़ी उठाऊ और भेन्चोद गाँव के सांड की तरह अपना लंड पेल के फकाफक चोद दू. थोड़ी गांड तो फटती ही थी की चाची का भरोसा नहीं......२ बार ठुकने के बाद भी वो यूँही जताती मानो कुछ न हुआ हो......

मैंने कही पढ़ा था की बिल्ली अक्सर चूहे को पकड़ के उसके साथ खेलती है.....आखिर में तो खाना है मगर बार बार छोड़ देती है....चूहा यह सोचकर भागता है की चलो जान बची.....मगर बिल्ली फिर से पकड़ लेती है और आखिर में खेल से बोर होकर चूहे को खा लेती है.

चाची भी मेरे साथ खेल रही थी.....यह चाची भी जानती थी और मैं भी....की हमारे बिच क्या हुआ था....मगर चाची का अनजान बनना......बिल्ली के खेल जैसा था.......अगर मैं अभी चाची को पकड़ने की कोशिश करता तो यक़ीनन वो सती सावित्री बन जाती....मुझे डांटती या यु कहे मेरी गांड की फटफटी चलाती......और मुझ से ऐसे चूतिये जैसे बैठते बन नहीं रहा था.

यह चूहे बिल्ली का खेल बहुत चल गया.......खून का दौरा लंड से दिमाग में जाने लगा......चाची चुदेगी मगर अब खेल चाची का नहीं लल्ला का चलेगा.

 अब मेरे दिल और दिमाग में जंग होने लगी, या यूँ कहे की बाबुराव और दिमाग में जंग होने लगी. बाबुराव ठुनकी मार मार के बोल रहा था की भाई पकड़ इस भेन की लोड़ी को और इसकी मुनिया की चुनिया बना दे और दिमाग बोल रहा था की चाची बगैर नाटक नौटंकी करे मानेगी नहीं. मैंने हिम्मत बटोरी और चाची से कहा,

"च....च....चाची......आप जाओ.....म.....म.....म....मैं...चोट...साफ़ कर लूँगा.......वैसे भी मुझे नहाना है"

चाची का मुंह खुला का खुला ही रह गया. चाची मुझे तड़पा कर मजे करना चाहती थी मगर चाची के खेल में लोचा हो गया था. एक दो सेकण्ड तो चाची ने मुझे देखा और फिर बाबुराव को.....अपनी नज़रों से सहलाया.

मेरा मन फिर से डोलने लगा......हाय.....इसकी......तो...........ले.......ही.......लूँ...........मगर मैंने अपने आप को संभाला. चाची मेरे पैरों के पास से उठी.....उठने से उनके दोनों मम्मे फिर से झूल गए....मेरी नज़रे उन पर ही टिकी थी.......अचानक चाची ने मुझे देखा.......और मुझे मम्मो को टापते हुए पकड़ लिया.....चाची ने तिरछी मुस्कान मारी............हाय लौड़ा मेरा घायल हो गया.

चाची ने अपने पल्लू को ठीक किया और अपनी कमर लचकाते हुए मेरे रुम से बाहर चली गयी.

अगर चाची को तडपाने का गेम खेलना था तो मैं अभी अब इस खेल के नियम समझ रहा था.

मेरे मोबाईल की घंटी बजी.....मैंने देखा तो माँ का फोन था.

"हल्लो......लल्लू........तेरी चाची को बोल देना......मैं गुप्ता आंटी के यहाँ जा रही हूँ.......शाम तक आ जाउंगी"

मैं हाँ हूँ कर के फोन रख दिया......अब मैं और चाची मैदान-ए-जंग में अकेले थे.

मैंने धीरे धीरे करते करते अपनी जींस पूरी उतारी.....भोसड़ी की रगड़ से घुटना पूरा छील गया था.
कपडे उतारते हुए येही सोच रहा था की चाची के साथ ऐसा गेम खेलु की यह बार बार की चूहा बिल्ली वाली कहानी ख़तम हो. चुल तो चाची को बहुत थी मगर खुल के न वो सामने आ रही थी और न ही मैं.

सारे कपडे खोल के टोवल बांधा और बाथरूम में घुसा. टॉवल टांगा और कमोड का ढक्कन लगा कर उस पर बैठ गया, मैंने सोचा चोट का अच्छे से मुआयना कर लूँ......भेन्चोद.....ऐसा दर्द हो रहा था की बस.......

टांगो पर जगह जगह मिटटी और कीचड़ लगा था......मैंने सोचा नल के निचे करके धोना पड़ेगा.....
अंडरवियर उतरा तो बाबुराव बिना सहारे झूल गया......मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी....चाची के चूहा बिल्ली की खेल में बेचारे बाबुराव के साथ KLPD हो गयी थी. मैंने बाबुराव को मुठी में लिया...और मेरा वफादार सिपाही तुरंत सर उठाने लगा....अब चाची की मुनिया मिलने का तो ठिकाना था नहीं....मैंने धीरे धीरे अपने बाबुराव के सर पर हाथ फेरना शुरू कर दिया......म्मम्मम.......मज़ा आने लगा था......आनंद की अधिकता से मेरी ऑंखें बंद होने लगी.......मुझे चाची के हिलते झूलते मम्मे और लचकती गांड ही दिख रही थी. मेरा हाथ तेज़ी से चलने लगा......मद्धम सिस्कारिया मेरे मुह से निकलने लगी.....आह्ह......सस......स्स्स्स

तभी भड़क से दरवाजा खुला और चाची बोली, "लल्ला.....वाशिंग मशीन में कपड़े डालने थे और साबुन......हाय राम......क्या कर रहा है रे निर्लज्ज........बेशरम...."

भेन्चोद....इंसान अपने बाथरूम की तन्हाई में चैन से मुठ भी नहीं मार सकता क्या ???

मैं तो मारे डर के उछल ही पड़ा.....गांड की फटफटी चल पड़ी

गांड फट के गले में आ गयी.

मैंने तुरंत बाबुराव को दोनों हाथ से छुपाया और कमोड पर ही बैठ गया. मैं हडबडाया हुआ बोल.

"भेन......म.....म....मेरा मतलब है की च...च...चाची......दरवाजा नॉक तो कर देते.....आपको बोल के तो नहाने आया.......था........."

चाची ऑंखें नाचते हुए बोली, " वाह वाह......बड़ा आया दरवाजा नॉक करने वाला......क्या कर रहा था रे बदमाश......."

मैंने नज़रे नीची कर ली......चाची फिर बोली, "बाहर बैठा बैठा तो बड़ा आह ऊह कर रहा था.....और यहाँ अन्दर क्या गुल खिला रहा है"

"च...च....च.....चाची.....मुझे यहाँ पर भी लगी है शायद.....वो ही देख रहा था.....", मैंने बात संभाली

 "रहने दे रे.....बड़ा आया.....लगी....है......चल नहा ले...."

"अरे.... आ....आ....आप तो बाहर जाओ...."

"हाय राम......मैं बाहर चली गयी तो इन कपड़ो का क्या होगा ?.......रात भर से भीगे पड़े है.....बदबू मारने लगेंगे......तू तो एक घंटा नहाने में लगा देगा ........तुझे मुझसे क्या.......मैं मेरा काम करती हूँ....तू तेरा काम कर...."

इसकी माँ का.....साकी नाका....यह साली चाहती क्या है.......???

चाची निचे झुक कर बाल्टी में से कपडे निकाल रही थी....उनकी पीठ मेरी तरफ थी.....निचे झुकने से उनके गदरायी......गोल......फुटबाल जैसी गांड उभर कर आ गयी थी और मुझसे सिर्फ एक फुट की दुरी पर थी.

हे भगवान....क्यों मेरे सब्र का इम्तेहान ले रहा है.....

बाथरूम तो छोटा सा थी था.....एक कोने में कुर्सी जैसा अंग्रेजी कमोड था जिस पर मैं विराजमान था.....और दुसरे कोने में वाशिंग मशीन रखी थी... वाशिंग मशीन और कमोड के बीच बाल्टी थी जिसपर चाची झुकी थी........

मैं अभी तक बाबुराव को हाथों में दबाये बैठा था.....और चाची झुकी हुयी बाल्टी में कपडे निकाल रही थी, ऐसा करने से उनके विशाल चुतड जेली जैसे हिल रहे थे....और अपुन का बाबुराव भी सिग्नल केच कर रहा था.

ऐसा लग रहा था मानो चाची की गांड एक बीन है और मेरा बाबुराव सपोला....चाची की गांड हिलती और उसके साथ मेरा बाबुराव ठुनकी पे ठुनकी मारता....कभी कभी फुफकार भी देता.

मेरी नज़र चाची के कुलहो पर ही थी तभी अचानक चाची पीछे हुयी और उनके कुल्हे मेरे चेहरे से टकरा गए........म्मम्मम्म........क्या नरम और क्या गरम........बाबुराव में नेटवर्क के सारे टावर आ गए थे...

चाची ओहो ओहो करके शरमा के हंसने लगी........मेरा तो हाल बुरा हो गया था.

चाची बोली..." अरे लल्ला......नालायक नहाता क्यों नहीं रे........यहाँ बैठा बैठा क्या कर
रहा है......जल्दी कर.....तेरी माँ आने वाली होगी......"

"म...म....मम्मी तो......गुप्ता आंटी के यहाँ गयी है.......शाम को आएगी......"

चाची धीरे से मुड़ी और मुझे देखा......मानो कुछ सोच रही हो.......बिल्ली अपने शिकार को नाप तोल रही थी.

"चलो......फिर तो सारे कपडे भी धो ही लेती हूँ.....अब पूरा दिन करुँगी क्या.......ला.....तू भी हाथ बटा........"

मैंने धीरे से कहा, "च...च....च....चाची आप बाद में धो ले न.....म...म...मैं नहा लूँ.....??"

"अरे राम.....नहा लेना....क्या जल्दी पड़ी है.......ला....तेरी अंडरवियर दे....धो दू ....."

मेरी अंडरवियर तो नल के निचे पड़ी थी.....मगर मैं कमोड से उठ जाता तो.....चाची की मेरे टावर की लोकेशन मिल जाती......बाबुराव तो जैसे फनफना रहा था.....मैंने दोनों हाथों से अपने सामान को ढक रखा था, चड्डी उठाता तो .......पर्दा उठ जाता.......

"च...च....चाची.....आ...आ...आप ही उठा लो न....."

चाची ने मुझे तिरछी नजर से देखा.....ऊपर से निचे तक........उनकी नज़रे निचे जाकर कुछ पल रुकी फिर वो मेरी आँखों में देख कर धीरे से मुस्कुराई....

कसम उडान छल्ले की.......मेरा तो अंग अंग ठरक से कांप गया.

चाची मेरी अंडरवियर उठाने के लिए झुकी, सहारे के लिए उन्होंने नल पर हाथ रखा और जैसे अंडरवियर उठाया...उनके हाथ से नल घूम गया और शावर फुल स्पीड में शुरू हो गया.......

शावर की सीधी धार मुझ पर और उनके ऊपर पड़ी......पानी इतनी तेज़ी से आया की जब तक वो बंद करती तब तक चाची और मैं दोनों पुरे भीग चुके थे........

"हाय......राम.......उफ़........भीगा दिया.....रे.........हाय....हाय.......सब गीला हो गया......."

मैं तो अभी तक अपना बाबुराव हाथों से छुपाये कमोड पर बैठा था.

चाची वहां से हटी और मेरी अंडरवियर को भी बाल्टी में डाल दिया.....फिर बोली.....

"लल्ला........सारे कपडे भीग गए.....चल....कपडे धो कर साड़ी बदल लुंगी.....यूँभी....कपडे धोने में भी भीग ही जाती..........मरी ये साड़ी तो चिपक चिपक जा रही है "

भीगने के बाद साड़ी चाची से ऐसे ही चिपक गयी थी जैसे चाची पर साडी का लेमीनेशन कर दिया हो. उनकी साड़ी कुलहो से ऐसे चिपकी थी की पूरा का पूरा शेप दिख रहा था.......चाची घूमी तो मेरा दिमाग भी घूम गया.

चाची की गांड के सल में साड़ी फँसी थी, चाची ने आज भी पेंटी नहीं पहनी थी. चाची मुझसे बाते करती जा रही थी और इधर उधर भी देख रही थी.....

मैंने पूछा, "क..क...क....क्या हुआ चाची......"

"अरे मरा.....मेरा गाउन भी नहीं दिख रहा ....ऐसी पूरी गीली साडी में कैसे कपडे धोउ ?"

ये कहते कहते चाची ने अपनी गदराई गांड के सल में फँसी साड़ी को निकाला.........

सन्नी लिओनी के जिस्म की कसम मेरे कानो में से तो धुआं निकल गया....

मैंने कहा. "च...च...चाची....आप......बल्लू चाचा का शर्ट पहन लो....."

चाची ने एक पल के लिए सोचा फिर बोली, " हाँ रे.....धोना तो है ही.......उनकी शर्ट पहन के एक बार सारे कपडे मशीन में डाल देती हु फिर दूसरी साडी पहन लुंगी.....ये गीली साडी भी धो लुंगी....."

यह कहकर उन्होंने अपना पल्लू कंधे पर से उतारा और मेरे सर में एम्बुलेंस की लाइट लप झप करने लगी...मेरे कानो में सायरन बजने लगा.........चाची ने सफ़ेद ब्लाउस पहना था....मगर ब्रा नहीं पहनी थी.......भीगते ही ब्लाउस ने पर्दा उठा दिया था......भीगे हुए ब्लाउस में चाची के चुचुक......यानि निप्पल साफ़ दिख रहे थे.

चाची हाथ में अपने पल्लू लिए मानो पोस बना के खड़ी थी और मैं गंगुराम जैसे मुंह खोले उनका हुस्न अपनी आँखों से पी रहा था.

चाची बोली...."हाय राम....क्या देख रहा हे बेशरम....उधर मुंह कर........"

मैंने भी आज्ञाकारी बच्चे जैसे मुंह दूसरी ओर कर लिया मगर....कनखियों से देखना जारी रखा.

चाची ने अपनी साडी खोल दी......वो सफ़ेद पारदर्शी ब्लाउस और पेटीकोट में थी.....अब चाची ने शर्ट उठाया चाची ब्लाउस और पेटीकोट के ऊपर ही शर्ट पहन लेगी....और शो ख़तम.

मैंने भी सोचा...की चाची फिर से मेरे साथ चूहे बिल्ली का खेल खेलने लगी है....पहले तो मुझे गरम किया
और अब मुझे तड़पाते हुए अपने आप को पूरा ढक लेगी और मैं कुछ भी नहीं कर पाउँगा.

मुझे भी अपने आप पर कंट्रोल रखना है.....मैं भी कुछ नहीं करूँगा.

तभी चाची अपने ब्लाउस के हुक खोलने लगी.......मेरे बैठते हुए बाबुराव ने फिर हुँकार भरी......मैं तिरछी नजर करके सब देख रहा था.....एक पल में चाची का ब्लाउस निचे था.....और ये क्या....अगले ही पल में उनका पेटीकोट भी नीचे.

माँ चुदाने गयी बिल्ली और गधे की गांड में गया चूहा.......

 चाची ने बल्लू चाचा का शर्ट उठाया और इस से पहले की मैं कुछ देख पता अपने बदन पर डाल लिया.

माँ की चूत...ये फिल्म तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी,

भले ही मैं चाची को दो बार बजा चूका था फिर भी वो ऐसे नखरे और शर्म के कसीदे दिखा रही थी जैसे की कुछ हुआ ही न हो.....मेरे अरमान थे की मैं एक बार चाची का गदराया बदन मादरजात नंगा देखू.......इस के पहले बाबुराव के तो गांडफाड़ आनंद हो गए थे मगर नैनसुख नहीं मिला था. मगर साली इस हरामन ने बल्लू चाचा के शर्ट पहन के मेरे अरमानो का शीघ्रपतन करवा दिया.

मैं टॉयलेट के कमोड पर फिर से बैठ गया....और बाबुराव को अपने हाथों के निचे फिर से छुपा लिया. चाची शर्ट के बटन लगा चुकी थी. मगर बड़ी शान से ऊपर के २ बटन नहीं लगाये थे. मतलब चाची के मम्मे अपने पूरा कटाव दिखा रहे थे.

मैंने भी सोचा चलो ग़ालिब आज बालकनी के टिकेट पर फिल्म देखेंगे. चाची मेरे सामने सिर्फ बल्लू चाचा का काला शर्ट पहने खड़ी थी.शर्ट उनकी आधी जांघों तक था......पानी से भीगी उनकी जांघें बाथरूम की रौशनी में चिलचिला रही थी.

गुरु एक बात तो है......भारतीय नारी की गदरायी गांड और भरी भरी जांघों का तोड़ पूरी दुनिया में नहीं है.

चाची अपनी जगह पर थोडा सा घूमी और मेरा कथन सत्य साबित हो गया.

चाची की ५ फुट ४ इंच की फ्रेम में उनकी गांड ही गांड ही दिखती थी. ये हाल तो साड़ी में था.....शर्ट में कसी हुयी गांड तो कहर थी कहर.

गांड के दोनों गोले मुस्तेदी से अपना अपना परिचय दे रहे थे. हाय.....चाची को तो बस पकड़ के.....

"हाय राम.......क्या देख रहा है रे........बेशर्म......नहा और निकल बहार यहाँ से.", चाची चिल्लाई.

"क...क....क.....क्या......म..म....म...मैं......म.मम.मेरा मतलब है की नहीं चाची.....म.मम.मैं तो "
,मैं हकलाया.

चाची ने ऑंखें नचाई, "हाँ राम.....तो और क्या फिर......नहा और बाहर जा......"

अब कोई इस फुलझड़ी को बताये की मेरा राकेट लांच मोड में है. मैं तो बैठा था मगर बाबुराव खड़ा था.

मैं फिर हकलाया, "आ...आ....आ....आप कपडे धो लो चाची......मैं फिर न...न....नहा लूँगा..."

"हाय राम.....तब तक क्या मेरे सर पे ही बैठा रहेगा क्या.....? चुप चाप नहा और निकल यहाँ से...."

भेन्चोद,,,,,किस्मत में लिखे हो लोडे तो कहाँ से मिलेंगे पकोड़े.....???

मैं गरीब.....नंगा......अपने बाबुराव को अपने हाथों से छुपाये खड़ा हुआ और शोवर के निचे खड़ा हो गया.

चाची ठीक मेरे पीछे ही थी......वो झट से स्टूल पर बैठ गयी और बाल्टी से गीले कपडे निकालने लगी.
मैंने मन ही मन सोचा चलो बेटा....मोका तो गया....नहा लो और चलो .

मेरी पीठ चाची की और थी......मैंने शोवर को चालू करने के लिए हाथ बढाया और तभी ठन्डे पानी के छींटे मेरी नंगी गांड पर पड़े. मैं एक दम चिंहुक पड़ा.

चाची खिलखिला कर हँसने लगी......वो स्टूल पर उकडू बैठी थी. शर्ट उनकी जांघों पर ऊपर तक चढ़ आया था.....शर्ट सिमट कर उनकी चिकनी जांघें के जोड़ पर इकठ्ठा हो गया था. मुझे याद आया की चाची ने पेंटी नहीं पहनी है.

कीड़ा कुलबुलाने लगा.










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