Sunday, April 27, 2014

बदनाम रिश्ते--राजन के कारनामे--5

FUN-MAZA-MASTI

बदनाम रिश्ते--राजन के कारनामे--5

 वरुण बिस्तर पर मुंह के बल लेटा हुआ था और उसने अपना गांड ऊपर उठा रखा था और रिक्शावाला उसके गांड में अपनी दो उंगलियाँ अन्दर बाहर कर रहा था | मैंने देखा कि उसकी उंगलियाँ जेली जैसी चीज से चमक रहा था ...शायद वह वरुण के गांड को चिकनाई से तर कर रहा था ...तभी रिक्शावाला खडा हो गया और अपने लंड को बाहर निकाल कर टेबल पर रखे ट्यूब से जेली जैसी चीज निकालकर अपने लंड पर मलने लगा ...उसका लंड शानदार था ..लम्बाई लगभग मेरे बराबर था और मोटाई भी मेरे से थोड़ा ही कम रहा होगा | फिर उसने अपना लंड वरुण के गांड पर रखा और धीरे धीरे उसे अन्दर करने लगा ...वरुण का चेहरा खिड़की कि तरफ था परन्तु वह मुझे नहीं देख सकता था क्योंकि बाहर अन्धेरा था |

मैंने पहली बार किसी लड़के को किसी मर्द से गांड मराते देख रहा था और तब मैंने जाना कि औरतों की तरह लडको का भी गांड मारा जा सकता है …फिर भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की लड़के कैसे मोटे लंडो को अपने गांड में ले सकते है …लड़कियों की बात कुछ और है …..वो तो होती ही है चुदने के लिए ….और चुदते चुदते गांड भी मरा ले तो क्या फर्क पड़ता है ….परन्तु लड़के ……न .....न ...... न ….अविश्वसनीय ….अकल्पनीय ....

मै कोतुहल और उत्सुकता से खिड़की से झाँकने लगा ….
अब रिक्शावाला अपने लंड को वरुण के गांड में डालने लगा …मैंने देखा पहले वरुण का चेहरा दर्द से निचुड़ा फिर जैसे जैसे रिक्शेवाले ने आहिस्ते -आहिस्ते लंड को गांड में अन्दर बाहर करना शुरू किया वरुण के चेहरे पर मस्ती छाने लगा ..इधर मैंने भी अपना लंड पैंट से बाहर निकालकर थपकी देने लगा …समझाने लगा की ठहर अभी तुझे वरुण की गांड का मजा मिलने वाला है … | मई रिक्शे वाले के सामने नहीं आना चाहता था , इसलिए उसके चले जाने के बाद वरुण को ब्लैकमेल करके उसका गांड मारना चाहता था …परन्तु अगर रिक्शेवाले के जाने के बाद अगर वरुण ने इनकार कर दिया तो किस आधार पर मै उसे ब्लैकमेल कर पाउँगा …ये तो मौक़ा हाथ से गंवाने वाली बात हो जाती ..इसलिए मैंने तुरंत धावा बोलने का निश्चय कर लिया …



 एक दिन 11 बजे के करीब कालेज में वरुण ने मुझे क्लास बंक करके अपने घर चलने के लिए बोला क्योंकि उसकी माँ दो घंटे के लिए अपनी किसी सहेली के यहाँ जाने वाली थी | उसका घर कालेज से नजदीक है इसलिए एक क्लास ही बंक करना पड़ता अन्यथा मेरे घर पर जाने पर तो पुरे दिन की छुट्टी हो जाता इसलिए मौक़ा मिलने पर हम वरुण के घर ही जाते साथ ही उसका घर सुरक्षित भी था क्योंकि घर का मुख्य दरवाजा औटोमटिक लॉक था इसलिए गलती से खुला छुट जाने पर भी सिर्फ भिड़ा देने पर भी अपने आप बंद हो जाता और फिर चाभी से ही अन्दर या बाहर से खुलता | इसलिए हम उसके घर पहुंचकर वरुण के कमरे में निश्चिन्त होकर अपने काम में जुट गए …कमरा बंद करने की जरुरत भी नहीं समझा ....पहले धीरे धीरे फिर काम ने तेजी पकड़ लिया …मै तूफानी गति से वरुण की गांड मार रहा था …बस कुछ क्षणों में ही मै झड़ने वाला था की एक आवाज ने मुझे जडवत कर दिया …..हे ..भगवान् ! ……ये क्या हो रहा है …..छि.. छि ………………..वरुण ने अपनी माँ की आवाज पहचानते ही तुरंत मेरे नीचे से छिटककर बिस्तर के दूसरी तरफ कूद गया और इधर मेरा लंड ...फ …..क …..की आवाज के साथ वरुण की गांड से बाहर निकला और सांप की तरह हवा में एक बार लहराया मैंने उसे पकड़कर अपनी मुठ्ठी में भींच लिया क्योंकि विस्फोट तो हो चुका था और लावा बस ज्वालामुखी द्वार से बाहर निकलने को बेताब था …..मेरा दिमाग बिलकुल काम करना बंद कर दिया था ….मैं बस स्खलित होना चाहता था …..इसलिए मै अपना लंड दबाते हुए अपने आनंद के शत्रु उस आगंतुक की तरफ मुड़ा …..और तभी विस्फोट का लावा एक मोटी धार की शक्ल ले आगंतुक के गर्दन …छाती ….बांह …और …पेट …को तर कर दिया ……….अपनी माँ की ये स्थिति देख वरुण अपना पैंट समेटते हुए कमरे से बाहर की तरफ भागा ….

इ ….स ….स ….हे …..भ ..ग वा …न …. सा ..ले …ने ….मुझे ….भी …गंदा ….कर दिया ….छि .....छि........ह.रा मी …..कहीं …का …..उसकी माँ ने मुझे गालियाँ निकाली …..तब मुझे एहसास हुआ की वस्तुतः हुआ क्या …….और सारा माजरा समझते ही मैंने अपना पैंट उठाया और नंगे ही वरुण के पीछे पीछे कमरे से बाहर भागा और कमरे से बाहर आकर मैंने पैंट पहना तब तक वरुण अपना पैंट पहनकर तेजी से मुख्य द्वार को भड़ाक से खींचते हुए घर से बाहर भागा ……और जब मै बाहर भागने के लिए मुख्य द्वार को खींचा तो वो खुला ही नहीं …तब मुझे याद आया की ये तो ऑटोमेटिक लॉक है और ये चाभी के बिना नहीं खुल सकता ..और इसकी चाभी अभी या तो वरुण के पास थी या उसकी माँ के पास ..वरुण तो भाग चुका था और आंटी के सामने जाने की हिम्मत मुझमे नहीं थी ….साले वरुण ने डर और जल्दबाजी में मुझे फंसा दिया था …


 मै वहीँ कोरिडोर में कोने में खडा हो गया और सोंचने लगा क्या करूँ | इस तरह वहां खडा भी तो नहीं रह सकता था क्योंकि एक -डेढ़ घंटे बाद वरुण के पापा खाना खाने के लिए आते और मुझे वहां देखते तो स्थिति और बिगड़ जाता | हल तो एक ही दिखाई दे रहा था कि किसी तरह आंटी के पास जाकर उनसे माफ़ी मांगू ...उनके पैर पकडूँ....और किसी तरह उनसे चाभी लेकर दरवाजा खोलूं और फिर दुबारा इस घर में नजर न आऊं....|

इसलिए मन को समझाते हुए की इसके सिवा और कोई चारा nahi है , मै किसी तरह हिम्मत जुटाकर आंटी के पास जाने का फैसला किया | मै धीरे धीरे बोझिल कदमो से वरुण के कमरे की खिड़की तक पहुंचा और वहीँ से उचककर एक बार अन्दर झांका …..झांकते ही मेरे बढ़ते कदमो को ब्रेक लग गया …….अन्दर आंटी के साडी का पल्लू गिरा हुआ था और ब्लाउज के सारे बटन खुले हुए थे ….फिर मेरे देखते ही देखते उन्होंने अपना ब्लाउज निकाला और सफ़ेद ब्रा के हुक को भी हाथ पीछे ले जाकर खोल दिया ….और जैसे ही उन्होंने ब्रा को भी निकाला …उनके ये बड़े बड़े कबूतर आजाद हो गए …..मै पहली बार इतना बड़ा पर्वत सरीखे चुचियों को अपनी आँखों से देख रहा था जिसके बीच में ताना हुआ चुचक पर्वत शिखर जैसा प्रतीत हो रहा था और जिसकी घाटी में ‘मेरा लावा ’ अभी तक बह रहा था ….फिर आंटी ने बिस्तर पर पड़े टॉवेल से अपने शरीर को पोंछना शुरू कर दिया …. मै देखता और सोंचता रहा की अब क्या करूँ ?.... इस समय उनके सामने जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था ….. वहां पर खड़े खड़े आंटी द्वारा देख लिए जाने का भी भय था ….इसलिए मै उलटे पाँव वापस मुख्या द्वार के कारीडोर में आ गया …थोड़ी देर बाद आंटी वरुण के कमरे से निकली …साडी से उनका बदन ढंका हुआ था और उनके हाथ में ब्लाउज और ब्रा नजर आ रहा था …..शायद उन्होंने अपने नंगे जिस्म के ऊपर साडी वैसे ही लपेट लिया था ……पता नहीं किस भावनावश मै तुरंत कारीडोर के खम्भे की ओट में आ गया …जबकि मुझे वहीँ पर खडा रहना चाहिए था , कम से कम आंटी मुझे देख तो लेती कि मै अभी तक वहीँ हूँ ….फिर किसी तरह गिड़गिडाकर उनसे दरवाजा खुलवाता और फिर स्वतंत्र हो जाता ….परन्तु कहते है न -‘विनाशकाले बिपरीत बुध्धी’……आंटी कारीडोर तक आयी और दूर से दरवाजा देखकर वापस बाथरूम में घुस गयी ….परन्तु जब उन्हें बाथरूम में देर लगने लगा तो मै बेचैन होने लगा ….फिर मेरे मन में एक ख्याल आया कि आंटी चाभी तो बाथरूम में लेकर नहीं गयी होगी , चाभी जरुर उनके कमरे में ही होगी ……शायद …पर्स में ….मेरे दिमाग में बस एक ही बात आ रहा था कि किसी तरह चाभी मुझे मिल जाए और मै फुर्र हो जाऊं … मुझे क्या पता था कि मेरी ये सोंच एक और नयी मुसीबत पैदा करने वाली है ….. 


किसी तरह हिम्मत जुटाकर मै आंटी के कमरे की तरफ जाने लगा | रास्ते में मुझे बाथरूम से आंटी के नहाने और पानी गिरने की आवाज आ रही थी | तभी मुझे ख़याल आया कि मैंने अभी तक आंटी को पूर्णतः नग्न तो देखा ही नहीं है, सिर्फ उनकी बड़ी बड़ी चुंचियां ही देखा था और उनकी चूत और गांड देखने का इससे बढ़िया मौक़ा मुझे नहीं मिल सकता था , इसी भावनावश मै बाथरूम के पास जाकर कोई छेद ढूढने लगा परन्तु दरवाजा हैंडल से बंद और खुलने वाला था इसलिए उसमे कोई की-होल भी नहीं था , मै बेसब्र होकर किसी तरह अन्दर देखने की कोशिश करने लगा | तभी कहते है ना - जहां चाह , वहां राह | मुझे लकड़ी के दरवाजे के दो पाटो के बीच हल्का सा गैप मिला , वही से मै आँख सटाकर अन्दर देखने लगा ...आ..ह ...क्या नजारा था .... आंटी के बड़े बड़े भाड़ी भड़कम चुतर पानी डालने के क्रम में ऊपर नीचे हो रहे थे | आंटी के गोल गोल गांड को देखकर मेरे लंड ने सलामी दी |  

परन्तु काफी कोशिश के बाद भी मै उनका बुर देखने में कामयाब नहीं हो सका ...बस बुर के उभार का हल्का झलक सा मिला | मैंने अपना लंड निकालकर उसे मुठीयाने लगा ..लंड चिपचिपा सा लगा ..देखा तो जेली अभी तक चमक रहा था जो मैंने वरुण की गांड मारने के लिए लगाया था , मैंने रुमाल निकालकर उसे अच्छी तरह से साफ़ किया और फिर आँख दरार से सटाकर आंटी के नग्न बदन को देखते हुए अपने लंड को उमेठने लगा |थोड़ी देर बाद आंटी जब झुकी तब पीछे से आंटी के चूत के दरारों के दर्शन हुए .. मै धन्य हो गया ..आंटी अपने बदन पर साबुन मल रही थी और अपनी चूत कस कसकर रगड़ रही थी ...मै थोड़ी देर देखता रहा फिर ध्यान आया मुझे देर हो रहा है और अगर चूत के चक्कर में थोड़ी देर और रहा तो या तो पिटूंगा या जेल जाउंगा |

तब मैंने खड़े लंड को अपने पैंट में ठूंसते हुए चाभी सर्च करने आंटी के कमरे की तरफ चल पडा | कमरा काफी साफ़ सुथरा था ..बिस्तर भी करीने से सजा था , मैंने तकिये की तरफ देखा क्योंकि प्रायः तकिये के पास ही चाभी रक्खी जाती है परन्तु वहां पर एक छोटा टॉवेल के अलावा कुछ नहीं पडा था, फिर मैंने आलमारी की तरफ देखा जो कि खुला ही था परन्तु उसमे भी पर्स जैसा कुछ नहीं दिखा जिसमे मै चाभी ढूंढ़ सकूँ | फिर मैंने कमरे में नजर दौडाया ....बिस्तर के बिलकुल बगल में कमरे के दरवाजे के ठीक सामने ड्रेसिंग टेबल था और बिस्तर के दूसरी तरफ खिड़की के पास एक मेज था, सबसे पहले मैंने ड्रेसिंग टेबल पर नजर दौडाया ,फिर उसका ड्रावर खोलकर देखा परन्तु मुझे चाभी कहीं नहीं मिली | फिर मै बिस्तर के दूसरी तरफ कोने में रखे मेज के पास गया और वहाँ चाभी ढूंढने लगा लेकिन हाय रे मेरी किस्मत ... चाभी वहाँ भी नहीं मिला | फिर मै सोंचने लगा कि कहाँ हो सकता है ? मुझे पर्स भी नहीं दिखाई दे रहा था | फिर मुझे ध्यान आया कि आंटी तो सीधा बाहर से आकर वरुण के कमरे में गयी थी , तो शायद...... आंटी का पर्स वरुण के कमरे में ही होगा | यह ध्यान में आते ही मै अपने आप को कोसने लगा कि अगर थोड़ा भी दिमाग लगाया होता तो इस मुसीबत से निजात पा वरुण के घर से बाहर होता | अतः समय नष्ट ना करते हुए मै तुरंत वहाँ से निकलने को उदृत हुआ ही था कि बाथरूम का दरवाजा बंद होने और आंटी के कदमो कि आहट सुनकर मेरे पैरो को ब्रेक लग गए | कमरे से बाहर निकलने के प्रयास में ही पकड़ा जाता | मेरा दिमाग एकदम सुन्न हो गया ...दिल डर से बैठने लगा | क्या करूँ ? बेड के नीचे भी घुस नहीं सकता था क्योकि बेड बहुत नीचा था |

तभी आंटी ने कमरे में प्रवेश किया ....बिलकुल नग्न ....वो शायद बाथरूम में पहनने वाले कपडे ले ही नहीं गयी थी .....मै मूर्तिवत जहां खडा था ..वहीँ खिड़की के परदे और मेज के कोने में जडवत हो गया | आंटी सामान्य ढंग से चलते हुए बेड पर पड़े छोटे टावेल से शरीर पोंछा और ड्रेसिंग टेबल के पास आकर अपनी सुन्दरता को निहारने लगी...आंटी वास्तव में खुबसूरत थी ...हाँ शरीर पर थोड़ा चर्बी जरुर चढ़ गया था जो पेट के निचले हिस्से के रूप में लटक रहा था लेकिन वो भी बड़ी बड़ी चुंचियों और मांसल पुष्ट जाँघों के साथ मिलकर उनके इस उम्र में भी गदरायेपन का ही एहसास दिला रही थी | आंटी मुझे अभी तक देख नहीं पाई थी खिड़की से आने वाली रौशनी सीधे उनके शरीर पर पड़ रहा था और मै परदे के बगल में थोड़े अँधेरे में था |मै अब अपना डर भूलकर आंटी की नग्न सुन्दरता को निहारने लगा ...आ..ह... इस उमर में भी क्या गदराई थी वो . ..बड़ी बड़ी चुंचिया ...गोल मटोल तरबूज सरीखे चुतर ...और जांघो के जोड़ो के बीच में पाँवरोटी के समान फूली हुई बुर ....वास्तव में आंटी अभी भी चोदने लायक माल थी | जब आंटी ने खड़े खड़े अपना एक पैर उठाकर बिस्तर पर रखा और ड्रेसिंग टेबल से पाउडर का डब्बा उठाकर पाउडर का पफ पहले अपनी चूंचियों और फिर अपनी मखमली फूली हुई चूत पर लगाया तो उनकी चूत जो हलकी कालिमा लिए थी , परदे से छनकर आती हुई हलकी रौशनी में भी दूर से ही चमक उठी | चमकते चूत को देखते ही मेरे लंड ने सलामी दी , मैंने बाएं हाथ से लंड को कसकर पकड़ा | तभी आंटी चौकन्नी हुई और परदे की तरफ गौर से देखने लगी , शायद मेरे लंड उमेठने के कारण हुई हलचल के कारण उनका ध्यान परदे की तरफ गया था | फिर उन्होंने जैसे ही मुझे देखा और पहचाना ...उ..ई माँ ..कहते हुए नंगी ही बाथरूम की तरफ भागी | पीछे पीछे मै भी कमरे से निकलने के लिए भागा , इस क्रम में भागने के कारण आंटी के मटकते गांड के दर्शन कुछ क्षण और हो गए | मै सीधा फिर कारीडोर में ही जाकर रुका |

थोड़ी देर बाद बाथरूम से आंटी चिल्लाई - वरुण ....वरुण... कहाँ हो तुम ? बोलते क्यों नहीं ?वरुण ....वरुण..
तब मैंने बाथरूम के पास आकर जबाब दिया - आंटी ...वरुण घर पर नहीं है ? घर पर नहीं है का क्या मतलब ....तुम अन्दर कैसे आये ? आंटी बाथरूम से चिल्लाई -हे भगवान् .....अब मै बाथरूम से बाहर कैसे आऊं? थोड़ी देर शांत रहने के बाद फिर चिल्लाई - राजन ! मुझे कोई नाइटी मेरे कबर्ड से निकालकर दो | मै उनके कहे अनुसार एक नाइटी कबर्ड से निकालकर बाथरूम के दरवाजे के पास आकर पुकारा - आंटीजी अपनी नाइटी ले लीजिये | फिर जब आंटी ने थोड़ा सा दरवाजा खोलकर हाथ बाहर निकालकर मेरे हाथ से नाइटी ले लिया, तब आखरी बार हाथ , कंधे और चूंचियों के उपरी मांसल हिस्से का क्षण भर ही सही , दर्शन हुए | थोड़ी देर बाद आंटी नाइटी पहनकर बाथरूम से बाहर निकली और निकलते ही सवाल दाग दिया -तुम यहाँ क्या कर रहे हो? और अपने कमरे में जाने लगी | मै भी उनके पीछे पीछे उनके कमरे के दरवाजे तक गया | फिर वो बेड पर पैर नीचे लटकाकर बैठ गयी और तेज स्वर में बोली - तुमने जबाब नहीं दिया -वरुण कहाँ है और क्या कर रहा है ? तुम अन्दर कैसे आये ? तुम मेरे कमरे में क्या कर रहे थे ? जरुर उसने तुम्हे चाभी दी होगी .... लेकिन क्यों ? वो खुद कहाँ है ?? इतने सारे सवालों को एकसाथ सुनकर मै घबरा गया | मैंने धीरे से बोला - चाभी ही तो नहीं है | आंटी ने तब पूछा - क्या मतलब ? तब मैंने शर्मिन्दा होते हुए धीरे धीरे रुक रुक कर बताया की कैसे वरुण हडबडाहट में दरवाजा खींचकर भाग गया और मै अन्दर फंस गया |


हूँ... तो तुम प्रारम्भ से यहीं थे , बाहर गए ही नहीं ...आंटी शुष्क स्वर में बोली ...और मेरे कमरे में चाभी ढूंढ़ रहे थे | फिर वही हुआ जिससे मैं बचना चाहता था - आंटी का लेक्चर शुरू हो गया - तुम लोगो को शर्म नहीं आती ऐसा काम करते हुए ? पढ़ लिख कर भी ऐसा काम करते हो ? क्या तुम्हे पता नहीं है कि इससे बीमारियाँ होती है ...होती क्या है , तुम्हे तो बीमारी लग चुकी है ...मरोगे और क्या ?? आंटी लगातार बोले जा रही थी और मै सर झुकाकर सुन रहा था | अंत में मै आहिस्ते से बोला - आंटीजी प्लीज ! दरवाजा खोल दीजिये ,मै बाहर जाना चाहता हूँ | परन्तु आंटी शायद मुझे बख्शने के मुड में नहीं थी , उन्होंने मेरे ऊपर इल्जामो कि झड़ी लगा दी - कितना अच्छा था मेरा बेटा ..तुमने उसे बर्बाद कर दिया ..छिः कितनी गन्दी आदत डाल दी है उसे ..हे भगवान् कहीं उसे भी बीमारी न लग जाए ...भगवान् तुम्हे कभी माफ़ नहीं करेगा ...बोलो क्यों किया ऐसा ? अपने ऊपर सीधा इल्जाम आते देख मै तिलमिला उठा , फिर मैंने सच्चे और सीधे शब्दों में अपना सफाई देने लगा - वरुण को आदत मैंने नहीं लगाया ..वो तो पिछले दो सालों से इसका अभ्यस्त है , जब वह 'यादव' सर के यहाँ शाम को अकेले ट्यूशन पढने जाता था , उन्होंने ही उसे यह लत लगाया और ऐसा लगाया कि--- वह लौज के सारे सीनियरो का चहेता हो गया था , यहाँ तक कि वह छुट्टियों में उनके चले जाने पर लौज में ही रिक्शेवाले को बुलाकर .........
'प्लीज! चुप हो जाओ '-आंटी अपने कानो को हाथों से ढकते हुए बोली | फिर थोड़ी देर सोंचने के बाद धीरे से बोली - सच कह रहे हो ?आंटी को थोड़ा नरम पड़ते देख मेरा आत्मविश्वास बढ़ा , मै फिर बोला -बिलकुल सच आंटीजी ! कसम से !! बल्कि मेरे संपर्क में आने के बाद वरुण ने तो किसी और के पास जाना भी बंद कर दिया है ...अब वह सिर्फ मेरे पास ही आता है |
 
 
 
 
 


 यही तो मै नहीं चाहती राजन ! कि वो तुम्हारे इस ढंग से संसर्ग में रहे ....तुम अन्दर आओ , मै तुम्हे समझाती हूँ (मै अभी तक दरवाजे पर ही खडा था )उनके बुलाने पर मै बिस्तर के पास जाकर उनके सामने सर झुकाकर खडा हो गया (आँख मिलाने का हिम्मत कहाँ था , मुझमे )| फिर आंटी ने मुझे समझाना शुरू किया - देखो बेटा ! ये अच्छी बात नहीं है , तुमलोग सब कुछ भूलकर अपनी पढ़ाई -लिखाई पर ध्यान दो ...सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा | तुम्हे एक सच्ची सलाह देती हूँ कि जाकर किसी अच्छे डॉक्टर से अपना चेक-अप कराओ , सही इलाज से तुम्हारी बीमारी ठीक हो जायेगी | मै अब चौंका , आंटी ने बीमारी की बात पहले भी दो तीन बार बोली थी परन्तु मैंने उसे उनका गुस्सा समझा था , लेकिन अभी तो बिलकुल शान्ति से समझा रही थी | मैंने डर और उत्सुकता से पूछा- आंटी मुझे हुआ क्या है और कौन सी बीमारी के इलाज का सलाह दे रहीं है ? आंटी थोड़ी देर शांत रही फिर थोड़ी हिचकिचाते हुए बोली - बेटा ! तुम लोग जो करते हो वो अप्राकृतिक मैथुन है और इसी से इस प्रकार की बीमारियाँ लगती है |लेकिन आंटी मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मुझे हुआ क्या है ? आंटी बोली - मुझे लगता है तुम्हे कोई यौन रोग हुआ है | मै घबराया - आपको कैसे और कब पता चला कि मुझे ऐसा कोई रोग हो गया है ? आंटी थोड़ा अटकती हुई बोली - देखो बेटा ! इस प्रकार के रोग में लिंग में सूजन हो जाता है और दबाने पर दर्द भी करता है , दर्द का तो मुझे पता नहीं पर तुम्हारे लिंग में सूजन जरूर है ....मै ठीक कह रही हूँ न ? कोई बात नहीं , किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाओ ..सब ठीक हो जाएगा | मैंने प्रतिवाद किया - नहीं आंटी ! मेरे लिंग में कोई सूजन नहीं है ( क्योंकि आजतक न तो बुआ ने ऐसा कहा था और न ही दीदी ने, जिन दोनों को मै अच्छी तरह से चोद चुका था )| हाँ मेरा लिंग मेरे दोस्तों से बड़ा और थोड़ा मोटा है , लेकिन कुल मिलाकर सामान्य है | किसने कहा कि तुम्हारा लिंग सामान्य है -आंटी ने ताना मारा, मै फिर कहती हूँ कि तुम किसी को दिखा लो | मै बड़े असमंजस कि अवस्था में था - क्योंकि मुझे लग रहा था कि मुझे कुछ भी नहीं हुआ है और आंटी थी कि पुरे निश्चय के साथ मुझे यौन रोगी ठहरा रही थी |मै थोड़ी देर उहापोह कि स्थिति में रहा फिर हिम्मत करके मैंने आंटी से कहा - देखिये आंटीजी ! तब आपने कुछ क्षणों के लिए ही मेरा लिंग देखा था, शायद ठीक से ना देख पाने के कारण कोई भ्रम हो सकता है ....अगर आपको आपत्ति न हो तो ..........कहते कहते मै रुक गया
' तो क्या ' - आंटी ने पूछा
मेरी मदद कीजिये ......प्लीज एक बार दुबारा देख लीजिये , अगर आपको तब भी लगता है कि कोई गड़बड़ है तो मै डॉक्टर को दिखा लूंगा - मै गिड़गिड़ाया

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