वीरान हवेली --पार्ट-5
चार काले , एक सांवला और एक गोरा शरीर , थक कर निढाल हो चुके थे ……..झींगुरों की आवाजें माहौल को संगीत -मय बना रही थी ……..
एक खूबसूरत , राजसी युवती और एक कसी हुई कुंवारी लड़की की लुटी हुई इज्ज़तों का साक्षी चाँद , बेहद उदास लग रहा था और मानो शर्म के मारे , बादल के एक तुक्रे के पीछे छुपने की नाकाम कोशिश कर रहा हो …………दूर किसी सियार की हूऊऊ -हूऊऊ की आवाज़ , रूपाली को ऐसा एहसास दे रही थी मानो व्हो मौत के करीब हो ….और गिद्ध -सियार उसकी और बढ़ते चले आ रहे हों ……..धीरे -धीरे उसने आँखें बंद कर ली !
थोड़ी देर ही सोयी की उसे अह्शाश हुआ कोई उसकी चूत को सहला रहा हे! वो सत्तू था जिसने अभी तक उससे सिर्फ चुस्वाया ही था पर उसका भी दो बार पानी निकल गया था इसलिए वो अभी सिर्फ अंगुली ही कर रहा था ! रुपाली ने फिर अपनी आँखें बंद कर ली पर थोड़ी देर में दर्द के कारन उसे अपनी आँखे खोलनी पड़ी सत्तू शराब की बोतल का मुह उसकी चूत में दाल रहा था वो छटपटाने लगी ! उसे हटाना चाह पर कालू और मोतिया भी शायद उसके दर्द को मज़े से देखना चाहते थे इसलिए उन्होंने भी उसके हाथ पकड़ लिए ! अब सत्तू धीरे धीरे काफी बोतल अन्दर सरकता जा रहा था ! पहले तो उसका पतला मुह था पर अब वो बीच में मोटी होती जा रही थी ! कालू के लंड जैसी मोटी आधी बोतल सरका कर वो रुपाली के कसमसाते शरीर में अन्दर बाहर करने लगा ! रुपाली की दर्द से आँखे फट रही थी उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे कमला भी उसकी चूत को फटता देख रही थी ! फिर अचानक सत्तू ने बोतल को बाहर निकला और उस पर लेटते हुए अपना लंड रुपाली की चूत में दाल दिया ! रुपाली को रहत मह्सुश हुई ! उसे डर था कही सत्तू फिर से बोतल न दाल दे इसलिए वो सत्तू की गांड सहला रही थी खुद उचक रही थी सत्तू की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था ! रुपाली छह रही थी की जल्दी से सत्तू फारिग हो जाये उसके भी चूत में सनसनाहट शुरू हो चुकी थी! और वो भी उछल रही थी ! अचानक उसने सत्तू की गांड सहलानी शुरू कर दी सत्तू का आनंद बढ़ गया उसकी चुदाई की गति तेज हो गई ! रुपाली ने ये महसूस किया और धीरे से अपनी एक अंगुली सत्तू के गांड में दाल दी और सत्त्तु हाय ईईए.... मालकिन .... मर गया रीईईईई ये कहा से सीखा आआ .... मज़ा आ गया आआआआ..ह्ह्ह्हह्ह.....ले.....मे रा......बीज
और पैदा कर दे ठकुराइन के घर चमार ...!और अपना पानी छोड़ दिया काफी देर
चिपका रहा फिर उतर गया उसे संतुस्ती मिल गई की उसने भी ठकुराइन की चूत का
बजा बजा दिया हे ! रात घहराती जा रही थी अब रुपाली नींद के aagos में थी !
पूरे वक़्त रूपाली बेखुदी में कुछ ना कुछ बुदबुदाती रही . उसे कुच्छ याद नहीं था की कैसे मोतिया और सत्तू कमसिन कमला को लेकर , खेतों के बीच से होते हुए अपने कच्चे घरों की और बढ़ गए थे और कैसे कालू और मुंगेरी उसे हवेली की और पहुंचाने के लिए ले गए . जब होश संभाला तो अपनी वीरान हवेली बहुत पास नज़र आई .
सुबह के कोई सवा पांच बज रहे होंगे …….सूरज की हलकी लालिमा अँधेरे को चीरने को तैयार हो रही थी , मगर रूपाली को अब भी अन्धेरेपन के सिवा कुच्छ दिखाई नहीं दे रहा था .
हवेली के आँगन में गूंगा चंदर गुम -सुम सा आँगन की मुंडेर पे बैठा था . बगल में उसने अपना लाल -सफ़ेद गम्च्छा रखा हुआ था . उसने एक नज़र रूपाली को देखा , फिर कालू और मुंगेरी को और वापस रूपाली को . उसे समझ नहीं आ रहा था पूरी रात रूपाली किधर थी ?
चार काले , एक सांवला और एक गोरा शरीर , थक कर निढाल हो चुके थे ……..झींगुरों की आवाजें माहौल को संगीत -मय बना रही थी ……..
एक खूबसूरत , राजसी युवती और एक कसी हुई कुंवारी लड़की की लुटी हुई इज्ज़तों का साक्षी चाँद , बेहद उदास लग रहा था और मानो शर्म के मारे , बादल के एक तुक्रे के पीछे छुपने की नाकाम कोशिश कर रहा हो …………दूर किसी सियार की हूऊऊ -हूऊऊ की आवाज़ , रूपाली को ऐसा एहसास दे रही थी मानो व्हो मौत के करीब हो ….और गिद्ध -सियार उसकी और बढ़ते चले आ रहे हों ……..धीरे -धीरे उसने आँखें बंद कर ली !
थोड़ी देर ही सोयी की उसे अह्शाश हुआ कोई उसकी चूत को सहला रहा हे! वो सत्तू था जिसने अभी तक उससे सिर्फ चुस्वाया ही था पर उसका भी दो बार पानी निकल गया था इसलिए वो अभी सिर्फ अंगुली ही कर रहा था ! रुपाली ने फिर अपनी आँखें बंद कर ली पर थोड़ी देर में दर्द के कारन उसे अपनी आँखे खोलनी पड़ी सत्तू शराब की बोतल का मुह उसकी चूत में दाल रहा था वो छटपटाने लगी ! उसे हटाना चाह पर कालू और मोतिया भी शायद उसके दर्द को मज़े से देखना चाहते थे इसलिए उन्होंने भी उसके हाथ पकड़ लिए ! अब सत्तू धीरे धीरे काफी बोतल अन्दर सरकता जा रहा था ! पहले तो उसका पतला मुह था पर अब वो बीच में मोटी होती जा रही थी ! कालू के लंड जैसी मोटी आधी बोतल सरका कर वो रुपाली के कसमसाते शरीर में अन्दर बाहर करने लगा ! रुपाली की दर्द से आँखे फट रही थी उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे कमला भी उसकी चूत को फटता देख रही थी ! फिर अचानक सत्तू ने बोतल को बाहर निकला और उस पर लेटते हुए अपना लंड रुपाली की चूत में दाल दिया ! रुपाली को रहत मह्सुश हुई ! उसे डर था कही सत्तू फिर से बोतल न दाल दे इसलिए वो सत्तू की गांड सहला रही थी खुद उचक रही थी सत्तू की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था ! रुपाली छह रही थी की जल्दी से सत्तू फारिग हो जाये उसके भी चूत में सनसनाहट शुरू हो चुकी थी! और वो भी उछल रही थी ! अचानक उसने सत्तू की गांड सहलानी शुरू कर दी सत्तू का आनंद बढ़ गया उसकी चुदाई की गति तेज हो गई ! रुपाली ने ये महसूस किया और धीरे से अपनी एक अंगुली सत्तू के गांड में दाल दी और सत्त्तु हाय ईईए.... मालकिन .... मर गया रीईईईई ये कहा से सीखा आआ .... मज़ा आ गया आआआआ..ह्ह्ह्हह्ह.....ले.....मे
पूरे वक़्त रूपाली बेखुदी में कुछ ना कुछ बुदबुदाती रही . उसे कुच्छ याद नहीं था की कैसे मोतिया और सत्तू कमसिन कमला को लेकर , खेतों के बीच से होते हुए अपने कच्चे घरों की और बढ़ गए थे और कैसे कालू और मुंगेरी उसे हवेली की और पहुंचाने के लिए ले गए . जब होश संभाला तो अपनी वीरान हवेली बहुत पास नज़र आई .
सुबह के कोई सवा पांच बज रहे होंगे …….सूरज की हलकी लालिमा अँधेरे को चीरने को तैयार हो रही थी , मगर रूपाली को अब भी अन्धेरेपन के सिवा कुच्छ दिखाई नहीं दे रहा था .
हवेली के आँगन में गूंगा चंदर गुम -सुम सा आँगन की मुंडेर पे बैठा था . बगल में उसने अपना लाल -सफ़ेद गम्च्छा रखा हुआ था . उसने एक नज़र रूपाली को देखा , फिर कालू और मुंगेरी को और वापस रूपाली को . उसे समझ नहीं आ रहा था पूरी रात रूपाली किधर थी ?
कालू ने
कहा ,"सुबह सुबह हम लोग खेत को जाई रहे …..उँहा पे बेहोस पड़ी मिली हमका
ठकुराइन ….". रूपाली ने एक बार कालू की और देखा ……..कहना मुश्किल था ,
आँखों में नफरत थी , उदासीनता या सिर्फ एक कभी ना भरने वाला शून्य .
खामोशी से रूपाली हवेली में दाखिल हो गयी और अपने शयन -कख्श में घुसकर अपने बिस्तर पे गिर पड़ी . खयालो में कभी अपने मरे हुए पति को मुस्कुराता हुआ देखती तो कभी अपने ससुर और देवर को , जो सब पहले ही रूपाली को इस बड़ी सी ज़ालिम दुनिया में अकेला छोड़ के कबके जा चुके थे . फूट -फूट के रोने लगी बेचारी !
खामोशी से रूपाली हवेली में दाखिल हो गयी और अपने शयन -कख्श में घुसकर अपने बिस्तर पे गिर पड़ी . खयालो में कभी अपने मरे हुए पति को मुस्कुराता हुआ देखती तो कभी अपने ससुर और देवर को , जो सब पहले ही रूपाली को इस बड़ी सी ज़ालिम दुनिया में अकेला छोड़ के कबके जा चुके थे . फूट -फूट के रोने लगी बेचारी !
चंदर उसके पीछे पीछे अन्दर आया था और चंदर को कुच्छ समझ नहीं आया था . वोह किसी बेवक़ूफ़ बच्चे की तरह , रूपाली को रोता हुआ देख रहा था और अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था . रूपाली का रुदन ऐसा था मानो कोई जानवर गहरी पीड़ा में कराह रहा हो .बाहर से कालू और मुंगेरी खिसक चुके थे .......साथ ही चन्दन का वो लाल- सफ़ेद गमछा भी किसी योजना के तहत ले जा चुके थे !
चंदर ने धीरे से रोती हुई रूपाली के कंधे पे हाथ रखा . रूपाली धीरे से मुड़ी , उसने एक नज़र चंदर की और देखा और फिर जोर से उसे सीने से लगते हुए जोर जोर से रोने लगी ,"चंदर ….चंदर ……आआआआ ह्ह्ह्ह …….". जैसे जैसे चंदर ने रूपाली के चेहरे के निशाँ , गले पे खरोंच , ब्लाउज के दो टूटे हुए बटनों आदि पे गौर किया , उसकी आँखों का आगे सारा माजरा साफ़ होता चला गया . एक ही पल में नौकर -मालकिन का रिश्ता मानो ख़तम हो गया हो . ऐसा प्रतीत हो रहा था मनो , चंदर घर का मर्द था और रूपाली उसकी , इस घर की इज्ज़त , जिसको कुच्छ चमारों ने तार -तार करके रख छोड़ा था …..!
"ऊऊऊऊऊ ……आआआआआआआआआआआअ ggggggggggggg hhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh ….हाआआआआआआआआआ ……..आआआआआआआआआ ग्ग्ग्गग्ग्ग्गग्ग्ग्ग ह्ह्ह्हह्ह्ह्हह्ह ,", गूंगे के मुंह से कराह निकली और उसने इधर उधर देख के पास पड़ी बड़ी सी गुप्ती निकाल ली . जैसे ही रूपाली ने चंदर का वीभत्स चेहरा और हाथ में खुली हुई गुप्ती देखि ……वो जोर से चीखी ,"चंदर नहीं …..तुझे मेरी कसम , कोई भी ऐसा काम मत करना ….तुझे मेरी कसम ." चंदर जो गुप्ती को कालू के जिगर के पार कर देना चाहता था , रूपाली की बात सुन कर ठिठक के रुक गया …एक नज़र रूपाली को देखा और फिर उसने खतरनाक गुप्ती को पटक कर फ़ेंक दिया ……….जोर से रूपाली को सीने से लगाया और दोनों फूट फूट कर रोने लगे .
अब पंचायत............!
दोपहर , कोई 3 बजे का समय . चौपाल सजी हुई थी . गाँव के बीचों बीच बड़ा सा बरगद का पेड़ था और उसकी घनी छाया में चार चारपाइयां लगी हुई थी . एक पर गाँव के सरपंच , पंडित मिश्रा जी बैठे हुए थे . दूसरी चारपाई पे ठाकुर रणबीर सिंह , तीसरी पे ठाकुर श्री राम विराजमान थे . चौथी चारपाई को कुच्छ दूरी पे रखा गया था और उसपे नीच जाती के दो बुज़ुर्ग , किसान कुम्हार और छेदी मल्लाह बैठे थे . पंडित जी और दोनों ठाकुर अपना अपना हुक्का गुड -गुडा रहे थे जबकि किसान कुम्हार और छेदी मल्लाह अपने सूखे होंठों पे बीच बीच में जीभ फिरा लेते थे . कहना मुश्किल था की वोह ऐसा हुक्के के लालच में कर रहे थे या पंचायत की घबराहट की वज़ह से .15-20 साल पहले तक भी , सोचना भी नामुमकिन था की गाँव की पंचायत में नीच जाती के प्रतिनिधि हो सकते हों ……मगर जबसे समय बदला , लालू -मायावती का ज़माना आया और ग्राम स्तर पर भी पिच्च्दी जातियों को प्रतिनिधित्व मिलने लगा था . ठाकुर -बामन भी इस बात से डरते थे की कहीं कोई नासपीटा उन्हें शहरी अदालत में ज़ुल्म के मामले में न घसीट ले और अनमने मन से उन्होंने पंचायती स्तर पे भी पिछड़ी जात वालों को प्रतिनिधित्व देना शुरू कर दिया था ………चेहरे पे बेतरतीब दाढ़ी वाला किशन कुम्हार और घबराया हुआ छेदी मल्लाह इसी प्रतिनिधित्व के प्रतीक थे !
पंचों के सामने , एक तरफ गाँव के पगड़ी धारी ठाकुर और ब्रह्मण बैठे थे , और उनसे कुछ ही दूर गाँव का बनिया और वसिह्या समाज के चंद और प्रतिनिधि बैठे थे . दूसरी और गाँव के डोम -चमार -मल्लाह -नाइ वगैरह बैठे थे . ज़ाहिर है , किसी के सर पे कोई पगड़ी नहीं थी . सभी ठाकुर -बामन चारपाइयों और मूढों पे बैठे थे जबकि नीची जात वाले ज़मीन पे बैठे थे . किसी को कुच्छ भी अटपटा नहीं लग रहा था ये उनका रोज़ का काम था !एक ठाकुर नौजवान , नीलेश सिंह खड़ा हुआ और उसने हाथ के इशारे से सबको खामोश होने को कहा . सभी एकदम से खामोश हो गए . नीलेश ने अपनी जेब से एक कागज़ का टुकड़ा निकाला और पढना शुरू किया ,"आदरणीय सरपंच महोदय ! माननीय पंच घणो और ग्राम ब्रिजपुर के निवासियों ………….इतिहास गवाह है परम पिता परमेश्वर की असीम कृपा से , इस गाँव पे हमेशा इश्वर की अनुकम्पा बनी रही है और जब भी कोई मामला पंचायत तक पहुंचा है , पंच परमेश्वर ने हमेशा न्याय ही किया है . हमें आशा ही नहीं , बिस्वास है , की आज भी यही होगा . मुकदमा गाँव की ठकुराइन , स्वर्गीय श्री शौर्य सिंह जी की बहू , आदरणीय रूपाली सिंह की और से दायर किया गया है …….उनका संगीन आरोप ये है , इसी गाँव के श्री कालू , श्री सातू , श्री मुंगेरी और श्री मोतिया ने कल रात , पच्छिम दिशा के खेतों में , उनकी और इसी गाँव की कुमारी कमला की इज्ज़त लूटी है ….अब आगे की कार्यवाही , आदरणीय सरपंच , पंडित मिश्रा जी को सौंपते हुए उनसे सभी ग्राम वासियों की तरफ से दरख्वास्त की जाती है की वोह न्याय और सिर्फ न्याय करें ….!
पंडित
मिश्रा जी ने अपना हुक्का एक और सरकाया और अपना गला खंखारते हुए , गंभीर
आवाज़ में सामने सर झुकाए बैठी हुई रूपाली से बोले ," वादी ठकुराइन श्रीमती
रूपाली सिंह जी ?"…………….रूपाली ने , जो लम्बे घूंघट में सफ़ेद साडी -ब्लाउज
में थी , घूंघट के अन्दर से ही सर हिलाकर हामी भरी . पंडित जी बोले
,"प्रतिवादी , कालू , मोतिया , मुंगेरी और सातू ?" चारों चमार , जो सामने
ज़मीन पे बैठे थे झट से बोले ,"जी परमात्मा ."
पंडित मिश्रा : श्रीमती रूपाली जी . विस्तार से बताएं क्या हुआ आपके साथ . घबराएं नहीं , यहाँ , सब अपने ही लोग हैं .
रूपाली : प्रणाम पंडित जी …..(झिझकते हुए ), वो कल , हमने सोचा के हवेली के आस -पास उगी घास -झाड -पतवार की …..
पंडित मिश्रा : हाँ हाँ …आगे बोलो …घबराओ नहीं …….
और धीरे धीरे रूपाली ने सारा किस्सा बयान किया . की कैसे उसने सोचा था की वो कोई गाँव का मजदूरहवेली लाएगी और पैसे दे कर हवेली के आस -पास सफाई करवाएगी …..कैसे उसने शाम के धुंधलके में कमला की चीख सुनी …...कैसे उसने कमला को बचने की कोशिश की थी और कैसे उल्टा उसी की इज्ज़त तार -तार कर बैठे थे ये चार वेह्शी दरिन्दे . अपना पूरा दर्द बयान किया रूपाली ने और सिसक सिसक कर रोने लगी .
गाँव की एक -दो बुज़ुर्ग ठाकुरों ने आगे बढ़कर उसे सीने से लगा लिया और उसके सर को सहलाने लगी
पंडित मिश्रा ने चारों अभियुक्तों पे एक नज़र डाली और पुछा उन्हें कुच्छ कहना है ?
कालू (गिडगिडाते हुए ): झूट है मालिक , एक दम झूट है . ईस्वर की सुन ऐसा कच्छु नाइ भया .
सत्तू , मोतिया और मुंगेरी ने भी उसकी हाँ में हाँ भरी .
रोपली सन्न थी . उसे उम्मीद थी ये कमीने गिडगिडाएंगे , माफ़ी मांगेंगे मगर ये तोह साफ़ मुकर रहे थे .
ठाकुर श्रीराम
: अभियुक्तों को अपनी सफाई में क्या कहना है ?
अभियुक्त :
धीरे धीरे सत्तू और मोतिया ने बारी बारी से अपनी सफाई पेश करनी शुरू की .
कुल मिला कर उन की बातों का सार यह था की, रूपाली की ये बात सच थी की वोह चारों खेत में बैठकर शराब पी रहे थे …….ये भी सच था की उन्होंने वहीं पर खाना भी खाया था और ये वो चारों खेतों में अक्सर करते थे . उनके मुताबिक़ वो चारों खा -पी रहे थे , हंसी -ठट्टा कर रहे थे और अचानक मुंगेरी को लगा था की खेतों से किसी औरत के धीमे से हंसने की आवाज़ आई थी . बाकी तीनो ने इसे मुंगेरी का भ्रम या नशे की अधिकता समझा लेकिन कुच्छ देर बाद जब कालू को भी ऐसा लगा खेत से आवाजें आ रही है तोह वे चारों आवाज़ के स्रोत को ढूँढने में लग गए और जल्दी ही उन्होंने वोह जगह ढूंढ ली जहां कुच्छ गन्ने उखाड़ के थोड़ी जगह समतल की गयी थी …..और फिर ……उन चारों की आँखें फटी की फटी रह गयी ......![]()
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सत्तू : हुज़ूर …हम देखे ….हम देखे की ठकुराइन खेत माँ नंगा लेटी रहीं …..और उनका ऊपर …उनका ऊपर ……i गूंगा चंदर रहा ……." और उसने अपनी ऊँगली वहाँ पे खामोशी से बैठे चंदर ki और घुमा दी .
रूपाली चिल्लाई ,"क्या आआआआआआआआआआआआआअ ????? कमीनो ! झूट बोलते ज़बान ना जल गयी तुम्हारी . हरामजादों ……..ये गूंगा बेचारा तोह रात भर हवेली में
था ……गंदे काम करते हो और बेजुबान पे इलज़ाम लगाते हो कमीनो ……..भगवान् करे
निरवंश हो जाओ तुम …......कोई आग देने वाला ना रहे तुम्हारे गंदे बदन को
….."![]()
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ठाकुर श्री राम ने रूपाली को पंचायत की बे -अदबी ना करने की सलाह दी और वोह एक आह भरके चुप बैठ गयी .![]()
कालू और मोतिया ने मज़े ले लेकर बयान किया की कैसे कैसे चंदर और रूपाली ने उनकी नज़रों से बेखबर , अलग अलग मुद्राओं में हवस के सागर में गोते लगाए थे . मुंगेरी सर झुकाए सब कुच्छ चुप चाप सुन रहा था .पंच छेदी मल्लाह ने अपने तम्बाखू से सादे हुए दांत निकाले और बोला ,"ठकुराइन ने कहा है की हमरे गाँव की कमला की इज्ज़त से भी खिलवाड़ किये हैं ये चारों ……सरपंच महाराजा की आज्ञा हो तोह कमला को भी बुलवाई लिया जाए ."![]()
आगया मिलते ही 2-3 चमार महिलाओं ने आवाज़ लगायी ,"कमलाआआ ….आये कमलाआआआ …" और थोड़ी देर में सर झुकाए गठे बदन की सांवली सलोनी , मांसल कमला पंचायत के सामने थी . उसके चूतडों का कटाव और सखत चूचियों का उभार देख कर गाँव के कई चमार और ठाकुर छोकरों ने आहें भरी .![]()
कुच्छ
चमार छोकरे रूपाली के पैरों की गोरी गोरी उँगलियों और हाथों की गोरी
खूबसूरती को देख के अंदाजा भर लगा रहे थे की कितना मज़ा आया होगा या तो चंदर
को या फिर इन चार अध् बूढ़े चमारों को . ![]()
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घबरा के झूरी ने अपने सर के ऊपर 2-3 बार हाथ फिराया ……इशारा समझ कर फ़ौरन कमला ने अपने सर के ऊपर दुपट्टा रख लिया अपना . Sir और मुंह आधा धक् गया था और छाती की गोलाइयाँ पूरी छिप गयी थी . गाँव के कई छोकरों को रणबीर सिंह पे गुस्सा आ रहा था .![]()
किसान कुम्हार : ए मौढ़ी ….तू कल शाम खेत मा का करने गयी थी ?
कमला : खेत मा ? हम तोह पूरी रात अपने घर मा ही थे .
सन्न सी रह गयी रूपाली चिल्लाई ,"क्या बक रही है कमला ? तू नहीं चाहती इन पापियों को इनके किये की सज़ा मिले ?"
कमला ने अपराध बोध से रूपाली को एक पल के लिए देखा और फिर बोली ,"हमसे झूट न बुलवाओ ठकुराइन …..किसी ने कुच्छ नहीं किया हमरे साथ ……" और वोह रोटी हुई , अपने घर की और भाग गयी थी .
रूपाली अंदाजा भी नहीं लगा सकती थी की कैसे कमला के गरीब माँ -बाप ने उसको धमकाया था की अगर किसी को इस हादसे की भनक भी पद गयी तो कोई उसके साथ शादी -बियाह नहीं करेगा और पूरी ज़िन्दगी उसे रांड -पतुरिया का जीवन निभाना पड़ेगा .![]()
माँ -बाप और उसकी मामी ने उसको समझाया था की अगर पंचायत बैठी , तोह साफ़ साफ़ मुकर जाने में ही उसकी और खानदान की भलाई है . झूरी ने साफ़ कहा था की अगर उसने पंचायत में कहा की उसकी इज्ज़त खराब हो चुकी है , तोह वो पहले उसका गला काटेगा और फिर खुद फांसी लटक जाएगा .![]()
गुस्से से बिफरी हुई रूपाली ने समस्त चमारों को मनन में गाली दी और दिल में कहा ,"हराम जादी …रंडी कमला ."
मोतिया और सत्तू झिझक झिझक कर , अटक अटक के सबको बता रहे थे की कैसे चंदर और रूपाली खेत में रास लीला रचा रहे थे . कालू ने 2-4 बातें और जोड़ी और कहा की जैसे ही मालकिन की नज़रें हम पर पड़ी , उन्होंने किसी को कुच्छ ना बताने को कहा …….सत्तू बोला ,"ठकुराइन हमें भी कहे रही …की चाहो तोह हमरे संग सो जाओ ….मगर किसी के कच्छु नयी कहो …हाथ जोड़ी तुम्हरा …"
उन चारों ने अपने अपने इष्ट देव की कसम खायी और कहा की उन चारों ने तोह तय कर लिया था की किसी को कुच्छ नहीं कहेंगे …….मगर यहाँ तोह मामला ही उल्टा था ? ठकुराइन ने तोह घबराहट में उन्ही के ऊपर उल्टा मुकदमा दायर कर दिया था .
सभी पंचों ने आपस में कुछ गुप -चुप सलाह मशविरा किया और गाँव के 2-3 बामन -ठाकुर और 2 चमार छोकरों को फ़ौरन खेत जा क़र मौके का मुआयना करने को कहा ………और कहा की अगर कुच्छ भी मौके से मिले तोह ले कर पंचायत वापस आ जाएँ .
सभी छोकरों को इस कार्यवाही में बड़ा मज़ा आ रहा था …..इसलिए वो बड़े अनमने मन से खेतों की और चल दिए .![]()
इस दौरान सभी लोगों के बीच हलचल मची हुई थी . ठाकुर -बामनो को लग रहा था चमारों ने ना सिर्फ रूपाली की इज्ज़त लूटी बल्कि अपनी छोकरी को डरा -धमका लिया है .
नीची जाती वाले रूपाली को नफरत से देख के सोच रहे थे कोई अपनी हवस के लिए इतना गिर सकता है क्या ? उन्हें लग रहा था रूपाली ने उनके समाज के चार प्रतिष्ठित बुजुर्गों पे प्रहार kiya hai !एक ठाकुर घर से कुच्छ औरतें चाय लेकर आई और उन्होंने सभी पंचों को चाय दे दी . मिश्र जी , रणबीर सिघ और ठाकुर श्री राम को स्टील की गिलास में और किसान कुम्हार और छेदी मल्लाह को कांच के गिलास में . कुम्हार और मल्लाह जानते थे ऐसा क्यूँ है . उन्हें मालूम था बाद में ये गिलास तोड़ दिए जायेंगे ……किसी को कुच्छ भी अटपटा नहीं लगा ….येही सदियों की रीत थी .![]()
कोई 30-40 मिनिट बाद , जो छोकरे खेतों की तरफ गए थे , वो वापस आ गए . उन्होंने कुच्छ खाली देसी शराब की बोतलें , कुच्छ चूड़ियों के टुकड़ों के अलावा ……एक गमछा भी पंचों को सौंप दिया …..एक लाल -सफ़ेद गमछा !
पंडित मिश्रा : श्रीमती रूपाली जी . विस्तार से बताएं क्या हुआ आपके साथ . घबराएं नहीं , यहाँ , सब अपने ही लोग हैं .
रूपाली : प्रणाम पंडित जी …..(झिझकते हुए ), वो कल , हमने सोचा के हवेली के आस -पास उगी घास -झाड -पतवार की …..
पंडित मिश्रा : हाँ हाँ …आगे बोलो …घबराओ नहीं …….
और धीरे धीरे रूपाली ने सारा किस्सा बयान किया . की कैसे उसने सोचा था की वो कोई गाँव का मजदूरहवेली लाएगी और पैसे दे कर हवेली के आस -पास सफाई करवाएगी …..कैसे उसने शाम के धुंधलके में कमला की चीख सुनी …...कैसे उसने कमला को बचने की कोशिश की थी और कैसे उल्टा उसी की इज्ज़त तार -तार कर बैठे थे ये चार वेह्शी दरिन्दे . अपना पूरा दर्द बयान किया रूपाली ने और सिसक सिसक कर रोने लगी .
गाँव की एक -दो बुज़ुर्ग ठाकुरों ने आगे बढ़कर उसे सीने से लगा लिया और उसके सर को सहलाने लगी
पंडित मिश्रा ने चारों अभियुक्तों पे एक नज़र डाली और पुछा उन्हें कुच्छ कहना है ?
कालू (गिडगिडाते हुए ): झूट है मालिक , एक दम झूट है . ईस्वर की सुन ऐसा कच्छु नाइ भया .
सत्तू , मोतिया और मुंगेरी ने भी उसकी हाँ में हाँ भरी .
रोपली सन्न थी . उसे उम्मीद थी ये कमीने गिडगिडाएंगे , माफ़ी मांगेंगे मगर ये तोह साफ़ मुकर रहे थे .
ठाकुर श्रीराम
अभियुक्त :
कुल मिला कर उन की बातों का सार यह था की, रूपाली की ये बात सच थी की वोह चारों खेत में बैठकर शराब पी रहे थे …….ये भी सच था की उन्होंने वहीं पर खाना भी खाया था और ये वो चारों खेतों में अक्सर करते थे . उनके मुताबिक़ वो चारों खा -पी रहे थे , हंसी -ठट्टा कर रहे थे और अचानक मुंगेरी को लगा था की खेतों से किसी औरत के धीमे से हंसने की आवाज़ आई थी . बाकी तीनो ने इसे मुंगेरी का भ्रम या नशे की अधिकता समझा लेकिन कुच्छ देर बाद जब कालू को भी ऐसा लगा खेत से आवाजें आ रही है तोह वे चारों आवाज़ के स्रोत को ढूँढने में लग गए और जल्दी ही उन्होंने वोह जगह ढूंढ ली जहां कुच्छ गन्ने उखाड़ के थोड़ी जगह समतल की गयी थी …..और फिर ……उन चारों की आँखें फटी की फटी रह गयी ......
सत्तू : हुज़ूर …हम देखे ….हम देखे की ठकुराइन खेत माँ नंगा लेटी रहीं …..और उनका ऊपर …उनका ऊपर ……i गूंगा चंदर रहा ……." और उसने अपनी ऊँगली वहाँ पे खामोशी से बैठे चंदर ki और घुमा दी .
ठाकुर श्री राम ने रूपाली को पंचायत की बे -अदबी ना करने की सलाह दी और वोह एक आह भरके चुप बैठ गयी .
कालू और मोतिया ने मज़े ले लेकर बयान किया की कैसे कैसे चंदर और रूपाली ने उनकी नज़रों से बेखबर , अलग अलग मुद्राओं में हवस के सागर में गोते लगाए थे . मुंगेरी सर झुकाए सब कुच्छ चुप चाप सुन रहा था .पंच छेदी मल्लाह ने अपने तम्बाखू से सादे हुए दांत निकाले और बोला ,"ठकुराइन ने कहा है की हमरे गाँव की कमला की इज्ज़त से भी खिलवाड़ किये हैं ये चारों ……सरपंच महाराजा की आज्ञा हो तोह कमला को भी बुलवाई लिया जाए ."
आगया मिलते ही 2-3 चमार महिलाओं ने आवाज़ लगायी ,"कमलाआआ ….आये कमलाआआआ …" और थोड़ी देर में सर झुकाए गठे बदन की सांवली सलोनी , मांसल कमला पंचायत के सामने थी . उसके चूतडों का कटाव और सखत चूचियों का उभार देख कर गाँव के कई चमार और ठाकुर छोकरों ने आहें भरी .
गाँव के कई लंड कसी हुई धोतियों और पायजामो के अन्दर कसमसा रहे थे सांस लेने के लिए और पूर्ण आज़ादी पाने के लिए .
एक दुबला पतला चमार छोकरा ये नहीं तय कर पा रहा था की अगर उसको ठकुराइन और कमला दोनों चोदने को मिल जाएँ तोह वो पहले किसको चोदेगा ?![]()
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कमला
के खुले सर पे एक नज़र डालते हुए ठाकुर रणबीर सिंह उसके बाप , झूरी मल्लाह
की और देखते हुए गरज के बोले ,"ए झूरी …..ठाकुरों के आगे कैसे पेश आते हैं ,
सऊर नहीं है तोहरी मौढ़ी को ?"घबरा के झूरी ने अपने सर के ऊपर 2-3 बार हाथ फिराया ……इशारा समझ कर फ़ौरन कमला ने अपने सर के ऊपर दुपट्टा रख लिया अपना . Sir और मुंह आधा धक् गया था और छाती की गोलाइयाँ पूरी छिप गयी थी . गाँव के कई छोकरों को रणबीर सिंह पे गुस्सा आ रहा था .
किसान कुम्हार : ए मौढ़ी ….तू कल शाम खेत मा का करने गयी थी ?
कमला : खेत मा ? हम तोह पूरी रात अपने घर मा ही थे .
सन्न सी रह गयी रूपाली चिल्लाई ,"क्या बक रही है कमला ? तू नहीं चाहती इन पापियों को इनके किये की सज़ा मिले ?"
कमला ने अपराध बोध से रूपाली को एक पल के लिए देखा और फिर बोली ,"हमसे झूट न बुलवाओ ठकुराइन …..किसी ने कुच्छ नहीं किया हमरे साथ ……" और वोह रोटी हुई , अपने घर की और भाग गयी थी .
रूपाली अंदाजा भी नहीं लगा सकती थी की कैसे कमला के गरीब माँ -बाप ने उसको धमकाया था की अगर किसी को इस हादसे की भनक भी पद गयी तो कोई उसके साथ शादी -बियाह नहीं करेगा और पूरी ज़िन्दगी उसे रांड -पतुरिया का जीवन निभाना पड़ेगा .
माँ -बाप और उसकी मामी ने उसको समझाया था की अगर पंचायत बैठी , तोह साफ़ साफ़ मुकर जाने में ही उसकी और खानदान की भलाई है . झूरी ने साफ़ कहा था की अगर उसने पंचायत में कहा की उसकी इज्ज़त खराब हो चुकी है , तोह वो पहले उसका गला काटेगा और फिर खुद फांसी लटक जाएगा .
गुस्से से बिफरी हुई रूपाली ने समस्त चमारों को मनन में गाली दी और दिल में कहा ,"हराम जादी …रंडी कमला ."
मोतिया और सत्तू झिझक झिझक कर , अटक अटक के सबको बता रहे थे की कैसे चंदर और रूपाली खेत में रास लीला रचा रहे थे . कालू ने 2-4 बातें और जोड़ी और कहा की जैसे ही मालकिन की नज़रें हम पर पड़ी , उन्होंने किसी को कुच्छ ना बताने को कहा …….सत्तू बोला ,"ठकुराइन हमें भी कहे रही …की चाहो तोह हमरे संग सो जाओ ….मगर किसी के कच्छु नयी कहो …हाथ जोड़ी तुम्हरा …"
उन चारों ने अपने अपने इष्ट देव की कसम खायी और कहा की उन चारों ने तोह तय कर लिया था की किसी को कुच्छ नहीं कहेंगे …….मगर यहाँ तोह मामला ही उल्टा था ? ठकुराइन ने तोह घबराहट में उन्ही के ऊपर उल्टा मुकदमा दायर कर दिया था .
सभी पंचों ने आपस में कुछ गुप -चुप सलाह मशविरा किया और गाँव के 2-3 बामन -ठाकुर और 2 चमार छोकरों को फ़ौरन खेत जा क़र मौके का मुआयना करने को कहा ………और कहा की अगर कुच्छ भी मौके से मिले तोह ले कर पंचायत वापस आ जाएँ .
सभी छोकरों को इस कार्यवाही में बड़ा मज़ा आ रहा था …..इसलिए वो बड़े अनमने मन से खेतों की और चल दिए .
इस दौरान सभी लोगों के बीच हलचल मची हुई थी . ठाकुर -बामनो को लग रहा था चमारों ने ना सिर्फ रूपाली की इज्ज़त लूटी बल्कि अपनी छोकरी को डरा -धमका लिया है .
नीची जाती वाले रूपाली को नफरत से देख के सोच रहे थे कोई अपनी हवस के लिए इतना गिर सकता है क्या ? उन्हें लग रहा था रूपाली ने उनके समाज के चार प्रतिष्ठित बुजुर्गों पे प्रहार kiya hai !एक ठाकुर घर से कुच्छ औरतें चाय लेकर आई और उन्होंने सभी पंचों को चाय दे दी . मिश्र जी , रणबीर सिघ और ठाकुर श्री राम को स्टील की गिलास में और किसान कुम्हार और छेदी मल्लाह को कांच के गिलास में . कुम्हार और मल्लाह जानते थे ऐसा क्यूँ है . उन्हें मालूम था बाद में ये गिलास तोड़ दिए जायेंगे ……किसी को कुच्छ भी अटपटा नहीं लगा ….येही सदियों की रीत थी .
कोई 30-40 मिनिट बाद , जो छोकरे खेतों की तरफ गए थे , वो वापस आ गए . उन्होंने कुच्छ खाली देसी शराब की बोतलें , कुच्छ चूड़ियों के टुकड़ों के अलावा ……एक गमछा भी पंचों को सौंप दिया …..एक लाल -सफ़ेद गमछा !
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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