Monday, May 24, 2010

सेक्सी कहानिया उषा की कहानी - पार्ट 1

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उषा की कहानी - पार्ट 1

उषा अपने मा-बाप की एकलौती लर्की है और देल्ही मे रहती है.
उषा के पिताजी, मिस्टर. जीवन शर्मा देल्ही मे ही एल आईसी. मे ऑफीसर थे
और पछले चार साल पहले स्वरगवसी हो गये थे और उषा की
माताजी, श्रीमती. रजनी एक हाउस वाइफ है. उषा के और दो भाई भी है
और उनकी शादी भी हो गयी है. उषा पीछले साल ही एम ए
(इंग्लीश) पास किया है. उषा का रंग बहुत हू गोरा है और उसके
फिगर 36-25-38 है. वो जब चलती है तो उसके कमर मे एक अजीब सी
बाल खाती है और चलते वक़्त उसकी चूतर बहुत हिलते है. उसके
हिलते हुए चूतर को देख कर परोस के कयी नवजवान, और बुर्हे
आदमी का दिल मचल जाता है और उनके लंड खरा हो जाता है. परोस
के कई लारकों ने काफ़ी कोशिश की लेकिन उषा उनके हाथ नही आई.
उषा अपने पढ़ाई और यूनिवर्सिटी के सन्गी साथी मे ही मुशगूल
रहती थी. थोरे दीनो के बाद उषा की शादी उसी सहर के रहने
वाले एक पोलीस ऑफीसर से तय हो गयी.
उस लरके के नाम रमेश था और उसके पिताजी का नाम गोविंद था और
सब उनको गोविंदजी कहकर बुलाते थे. गोविंदजी अपने जवानी के दीनो
मे और अपनी शादी के बाद भी हर औरत को अपनी नज़र से चोद्ते थे
और जब कभी मौका मिलता था तो उनको अपनी लौरे से भी चोद्ते थे.
गोविंदजी की पत्नी का नाम स्नेहलरा है और वो एक लेखिका है. अब
तब गिरिजा जी ने करीब 8-10 कितबे लिख चुकी है. गोविंदजी बहुत
छोड़ू है ऑरा अब तक वो अपने घर मे कई लर्की और औरत को चोद
चुके थे और अब जब की उनका काफ़ी उमर हो गया था मौका पाते ही
कोई ना कोई औरत को पटा कर अपनी बिस्तेर गरम करते थे. गोविद्जी
का लंड की लूम्बई करीब 8 1/2" लूंबा औ मोटाई करीब 3 ½" है और
वो जब कोई औरत की छूट मे अपना लंड डालते तो करीब 25-30 मिनूट
के पहले वो झरते नही है. इसीलिए जो औरत उनसे अपनी चूत
चुड़वा लेती है फिर दोबारा मौका पाते ही उनका लंड अपनी चूत मे
पिलवा लेती हैं.
आज उषा का सुहागरत है. परसों ही उसकी शादी रमेश के साथ हुए
थी. उषा इस समय अपने कमरे मे साज धज कर बैठी अपनी पति
का इन्तिजर कर रही है. उसकी पति कैसे उसके साथ पेश आएगा, एह
सोच सोच कर उषा का दिल ज़ोर ज़ोर से धारक रहा है. सुहग्रत मे
क्या क्या होता है, एह उसको उसकी भाभी और सहेलोएवँ ने सब बता
दिया था. उषा को मालूम है की आज रात को उसके पति कमरे मे आ कर
उसको चूमेगा, उसकी चूनस्िओं को दबाएगा, मसलेगा और फिर उसके
कपरों को उतार कर उसको नंगी करेगा. फिर खुद अपने कपारे उतार
कर नंगा हो जाएगा. इसके बाद, उसका पति अपने खरे लंड से उसकी
चूत की चटनी बनाते हुए उसको चोदेगा.
वैसे तो उषा को चुड़वाने की तजुर्बा शादी के पहले से ही है.
उषा अपने कॉलेज के दीनो मे अपने क्लास के कई लारकों का लंड अपने
चूत मे उतरवा चुकी है. एक लरके ने तो उषा को उसकी सहली के
घर ले जा कर सहेली के सामने ही चोदा था और फिर सहेली की
गॅंड भी मारी थी. एक बार उषा अपने एक सहली के घर पर शादी मे
गयी हुई थी. वहाँ उस सहली के भाई, सुरेश, ने उसको अकेले मे
चेर दिया और उषा का चूंची दबा दिया. उषा सिर्फ़ मुस्कुरा दिया.
फिर सहली के भाई ने आगे बढ़ कर उषा को पकर लिया और चूम
लिया. तब उषा ने भी बढ़ कर सहली के भाई को चूम लिया. तब
सुरेश ने उषा के ब्लाउस के अंदर हाथ डाल उसकी चूंची मसलने
लगा और उषा भी गरम हो कर अपनी चूंची मसलवाने लगी और एक
हाथ से उसके पॅंट के उप्पेर से उसके लॉंड पर रख दिया. तब सुरेश
ने उषा को पाकर कर छत पर ले गया. छत पर कोई नही था,
क्योंकी सारे घर के लोग नीचे शादी मे ब्यस्ते थे. छत पर जा
कर सुरेश ने उषा को छत की दीवार से खरा कर दिया और उषा से
लिपट गया. सुरेश एक हाथ से उषा की चूंची दबा रहा था और
दूसरा हाथ सारी के अंदर डाल कर उसकी बुर् को सहला रहा था. थोरी
देर मे ही उषा गरमा गयी और उसकी मुँह से तरह तरह की आवाज़
निकालने लगी. फिर जब सुरेश ने उषा की सारी उतरने चाहा तो उषा
ने मना कर दिया और बोली, "नही सुरेश हुमको एकदम से नंगी मत
करो. तुम मेरा सारी उठा कर, पीछे से अपना गधे जैसा लंड मेरी
चूत मे पेल कर मुझे चोद दो." लेकिन सुरेश ना माना और उसने उषा
को पूरी तरह नंगी करके उसको छत के मुंडेर से खरा करके उसके
पीछे जा कर अपना लंड उसकी चूत मे पेल कर उसको खूब रगर रगर
कर चोदा. छोद्ते समय सुरेश अपने हाथों से उषा की चूनचेओं को
भी मसल रहा था. उषा अपनी चूत की चुदाई से बहुत मज़ा ले रही
थी और सुरेश के हर धक्के के साथ साथ अपनी कमर हिला हिला कर
सुरेश का लंड अपनी चूत से खा रही थी. थोरी देर के बाद सुरेश
उषा की चूत चोद्ते चोद्ते झार गया. सुरेश के झरते ही उषा ने
अपनी चूत से सुरेश का लंड निकाल दिया और खुद सुरेश के सामने
बैठ कर उसका लंड अपने मुँह मे ले कर चट चट कर साफ कर दिया.
थोरी देर के बाद उषा और सुरेश दोनो छत से नीचे आ गये.
आज उषा अपनी सुहग्रत की सेज पर अपनी कई बार की चूड़ी हुए चूत ले
कर अपने पति के लिए बैठी थी. उसकी दिल ज़ोर ज़ोर से धारक रही
थी क्योंकी उषा को दर था की कहीं उसके पति एह ना पता चल
जाए की उषा पहले ही चुदाई का अनद ले चुकी है. थोरी देर के
बाद कमरे का दरवाजा खुला. उषा ने अपनी आँख तीर्ची करके देखा
की उसकी ससुरजी, गोविंदजी, कमरे मे आए हुए हैं. उषा का माता
तनका, की सुहग्रत के दिन ससुरजी का क्या कम आ गया है. खैर
उषा चुपचाप अपने आप को सिकोर बैठी रही. थोरी देर के बाद
गोविंदजी सुहाग की सेज के पास आए और उषा के तरफ देख कर
बोला,"बेटी मई जानती हूँ की तुम अपने पति के लिए इंटिजार कर हो.
आज के सब लरकेान अपने पति का इंतिज़ार करती है. इस दिन के लिए
सब लरकिओं का बहुत दीनो से इंतिज़ार रहती है. लेकिन तुम्हारा पति,
रमेश, आज तुमसे सुहग्रत मानने नही आ पाएगा. अभी अभी थाने
से फोन आया था और वो अपने यूनिफॉर्म पहन कर थाने चला गया.
जाते जाते, रमेश ए कह गया की सहर के कई भाग मे डकैती पारी
है और वो उसके छानबीन करने जा रहा है. लेकिन बेटी तू बिल्कुल
चिंता मत करना. मई तेरा सुहग्रत खाली नही जाने दूँगा." उषा
अपने ससुरजी की बात सुन तो लिया पर अपने ससुर की बात उसकी दीमाग
मे नही घुसा, और उषा अपना चहेरा उठा कर अपने ससुर को देखने
लगी. गोविंदजी आगे बढ़ कर उषा को पलंग पर से उठा लिया और
ज़मीन पर खरा कर दिया. तब गोविंदजी मुस्कुरा कर उषा से
बोले, "घबराना नही, मई तुम्हारा सुहग्रत बेकार जाने नही दूँगा,
कोई बात नही, रमेश नही तो क्या हुआ मई तो हूँ." इतना कह कर
गोविंदजी आगे बरह कर उषा को अपने बाँहों मे भर कर उसकी होठों
पर चुम्मा दे दिया.

जैसे ही गोविंदजी ने उषा के होठों पर चुम्मा दिया, उषा चौंक
गयी और अपने ससुरजी से बोली, "एह आप क्या कर रहें है. मैं आपके
बेटे की पत्नी हूँ और उस लिहाज से मै आप की बेटी लगती हूँ और
मुझको चूम रहें है?" गोविंदजी ने तब उषा से कह, "पागल लरकी,
अरे मई तो तुम्हारी सुहागरात बेकार ना जाए इसलिए तुमको चूमा. अरे
लरकियाँ जब शादी के पहले जब शिव लिंग पर पानी चढ़ाती है तब
वो क्या मांगती है? वो मांगती है की शादी के बाद उसका पति उसको
सुहागरात मे खूब रगरे. समझी? उषा ने पानी चहेरा नीचे करके
पूछी, "मै तो सब समझ गयी, लेकिन सुहागरात और रगार्ने वाली
बात नही समझी." गोविंदजी मुस्कुरा कर बोले, "अरे बेटी इसमे ना
समझने की क्या बात है? तू क्या नही जानती की सुहागरात मे पति और
पत्नी क्या क्या करते है? क्या तुझे एह नही मालूम की सुहागरात मे
पति अपने पत्नी को कैसे रगारता है?" उषा अपनी सर को नीचे
रखती हुई बोली, "हां, मालूम तो है की पहली रत को पति और
पत्नी क्या क्या करते और करवाते हैं. लेकिन, आप ऐसा क्यों कह रहें
है?" तब गोविंदजी ने आगे बढ़ कर उषा को अपने बाहों मे भर लिया और
उसकी होठों को चूमते हुए बोले, "अरे बहू, तेरी सुहागरात खाली ना
जाए, इसलिए मई तेरे साथ वो सब काम करूँगा जो एक आदमी और औरत
सुहागरात मे करते हैं."

उषा अपनी ससुर के मुँह से उनकी बात सुन कर शर्मा गयी और अपने
हाथों से अपना चहेरा ढँक लिया और अपने ससुर से बोली, "है! एह
क्या कह रहें है आप. मै आपके बेटे की पत्नी हूँ और इस नाते से मै
आपकी बेटी समान हूँ और मुझसे क्या कह रहें है?" तब गोविंदजी
अपने हाथों से उषा की चूंचीोन को पाकर कर दबाते हुए बोले, "हाँ
मै जनता हूँ की तू मेरी बेटी समान है. लेकिन मै तुझे अपने
सुहागरात मे तड़पते नही देख सकता और इसीलिए मै तेरे पास आया
हूँ." तब उषा अपने चहेरे से अपना हाथ हटा कर बोली, "ठीक है
बाबूजी, आप मेरे से उमर मे बारे हैं. आप जो भी कह रहें है,
तीक ही कह रहें हैं. लेकिन घर मे आप और मेरे सिबा और भी तो
लोग हैं." उषा का इशारा अपने सासू मा के लिए थी. तब गोविंदजी ने
उषा की चूंची को अपने हाथों से ब्लाउस के उपर से मलते हुए
कह, "उषा तुम चिंता मत करो. तुम्हारी सासू मा को सोने से पहले
दूध पीने की आदत है, और आज मै उनकी दूध मे दो नींद की गोली
मिला कर उनको पीला दिया है. अब रात भर वो आराम से सोती रहेंगी."
तब उषा ने अपने हाथों से अपने ससुरजी की कमर पाकरते हुए
बोली, "अब आप जो भी करना है कीजिए, मै मना नही करूगी."

तब गोविंदजी उषा को अपने बाहों मे भींच लिया और उसकी मुँह को
बेतहाशा चूमने लगे और अपने दोनो हाथों से उसकी चूनचेओं को
पाकर कर दबाने लगे. उषा भी चुप नही थी. वो अपने हाथों से
अपने ससुर का लंड उनके कपारे के उपर से पाकर कर मुठिया रही
थी. गोविंदजी अब रुकने के मूड मे नही थे. उन्होने उषा को अपने
से अलग किया और उसकी सारी की पल्लू को कंधे से नीचे गिरा दिया.
पल्लू को नीचे गिरते ही उषा की दो बरी बरी चूंची उसके ब्लाउस
के उपर से गोल गोल दिखने लगी. उन चूंची को देखते ही गोविंदजी
उन पर टूट परे और अपना मुँह उस पर रगार्ने लगे. उषा की मुँह से
ओह! ओह! आह! क्या कर रहे की आवाज़े आने लगी. थोरी देर के बाद
गोविंदजी ने उषा की सारी उतार दिया और तब उषा अपने पेटिकोट
पहने ही दौर कर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया. लेकिन जब उषा
कमरे की लाइट बुझाना चाही तो गोविंदजी ने मना कर दिया और
बोले, "नही बत्ती मत बंद करो. पहले दिन रोशनी मे तुम्हारी
चूत चोदने मे बहुत मज़ा आएगा." उषा शर्मा कर बोली, "ठीक है
मै बत्ती बंद नही कर ती, लेकिन आप भी मुझको बिल्कुल नंगी
मत कीजिएगा." "अरे जब थोरी देर के बाद तुम मेरा लंड अपनी चूत मे
पिलवाओगी तब नंगी होने मे शरम कैसा. चलो इधर मेरे पास आओ,
मै अभी तुमको नंगी कर देता हूँ." उषा चुपचाप अपना सर नीचे
किए अपने ससुर के पास चली आई.

जैसे ही उषा नज़दीक आई, गोविंदजी ने उसको पाकर लिया और उसके
ब्लाउस के बटन खोलने लगे. बटन खुलते ही उषा की बरी बरी गोल
गोल चूंचियाँ उसके ब्रा के उपर से दिखने लगी. गोविंदजी अब अपना
हाथ उषा के पीछे ले जाकर उषा की ब्रा की हुक भी खोल. हुक
खुलते ही उषा की चूंची बाहर गोविंदजी के मुँह के सामने झूलने
लगी. गोविंदजी तुरंत उन चूनचेओं को अपने मुँह मे भर लिया और
उनको चूसने लगे. उषा की चूनचेओं को चूस्ते चूस्ते वो उषा की
पेटिकोट का नारा खींच दिया और पेटिकोट उषा के पैर से सरकते
हुए उषा के पैर के पास जा गिरा. अब उषा अपने ससुर के सामने सिर्फ़
अपने पनटी पहने खरी थी. गोविंदजी ने झट से उषा की पनटी
भी उतार दी और उषा बिल्कुल नंगी हो गयी. नंगी होते ही उषा ने
अपनी चूत अपने हाथों से धक लिया और सर्मा कर अपने ससुर को
कनखेओं से देखने लगी. गोविंदजी नंगी उषा के सामने ज़मीन पर
बैठ गये और उषा की चूत पर अपना मुँह लगा दिया. पहले
गोविंदजी अपने बहू की चूत को खूब सुघा. उषा की चूत से
निकलती सौंधी सौंधी खुश्बू गोविंदजी के नाक मे भर गया. वो
बारे चाव से उषा की चूत को सूंघने लगे. थोरी देर के बाद उन्होने
अपना जीव निकल कर उषा की चूत को चाटना सुयृु कर दिया. जैसे ही
उनका जीव उषा की चूत मे घुसा, तो उषा जो की पलंग के सहारे
खरे थी, पलंग पर अपनी चूटर टीका दिया और अपने पैर फैला कर
अपनी चूत अपनी ससुर से चटवाने लगी. थोरी देर तक उषा की चूत
चाटने के बाद गोविंदजी अपना जीव उषा की चूत के अंदर डाल दिया
और अपनी जीव को घुमा घुमा कर चूत को चूसने लगे. अपनी चूत
चटाई से उषा बहुत गरम हो गयी और उसने अपने हाथों से अपनी
ससुर का सर पाकर कर अपनी चूत मे दबाने लगी और उसकी मुँह से
सी सी की आवाज़े भी निकालने लगी.
अब गोविंदजी उठ कर उषा को पलंग पर पीठ के बल लिटा दिया. जैसे
ही उषा पलंग पर लेती, गोविंदजी झपट कर उषा पर चार बैठ
गये और अपने दोनो हाथों से उषा की चूनचेओं को पाकर कर मसालने
लगे. गोविंदजी अपने हाथों से उषा की चूंची को मसल रहे थे
और मुँह से बोल रहे थे, "मुझे मालूम था की तेरी चूंची इतनी
मस्त होगी. मै जब पहली बार तुझको देखने गया था तो मेरा नज़र
तेरी चूंची पर ही थी और मैने उसी दिन सोच लिया था इन
चूनचेओं पर मै एक ना एक दिन ज़रूर अपना हाथ रखूँगा और इनको
रगर रगर कर दाबुँगा. "है! आह! ओह! एह आप क्या कह रहें है? एक
बाप होकर अपने लरके के लिए लर्की देखते वक़्त आप उसकी सिर्फ़
चूंचीोन को घूर रहे थे. ची कितने गंदे है आप" उषा मचलती
हुई बोली. तब गोविंदजी उषा को चूमते हुए बोले, "अरे मै तो गंदा
हूँ ही, लेकिन तू क्या कम गंदी है? अपने ससुर के सामने बिल्कुल
नंगी पारी हुई है और अपनी कुंचीोन को ससुर से मसलवा रही
है? अब बता क्यों ज़्यादा गंदा है, मै या तू?" फिर गोविंदजी ने
उषा से पूछा, "अक्चा एह बात की छुंची मसलाई से तेरा क्या हाल हो
रहा है?" उषा अपने ससुर से लिप्त कर बोली, ""ऊऊहह और जोरे से
हां ससुरजी और जोरे से दब्ाओ दब्ाओ मज़ा आरहा है मुझे, आपका
हाथ औरतों के चुम्ची से खेलने मे बहुत ही माहिर है. आपको पता
है की औरतों की चूंची कैसे दबाया जाता है. और ज़ोर से
दबाइए, मुझे बहुत मज़ा आ रहा है. फिर उषा अपने ससुर को अपने
हाथों से बाँधते हुए बोली, "अब बहुत हो गया है चूंची से
खेलना. आपको इसके आगे जो भी करने वाले हैं जल्दी कीजिए, कहीं
रमेश ना आ जाए और मेरी भी चूत मे खुजली हो रही है." "अभी
लो, मै अभी तुझको अपने इस मोटे लंड से चोदता हूँ. आज तुझको मै
ऐसा चोदुन्ग की तू जिंदगी भर याद रखेगी" इतना कह कर
गोविंदजी उठकर उषा के पैरों के बीच उकृू हो कर बैठ गये.















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