Monday, May 24, 2010

कामुक कहानिया एक गाँव की कहानी--4

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एक गाँव की कहानी पार्ट 04

घर के अंदर आते ही हरिया ने आशा को देखा जो अभियभी नहा कर निकली थी, पानी की बूँदें उसके चेहरे पे बड़ी अच्छी लग रही थी. उसे लगा इतनी खूबसूरत लड़की को शादी करवके के किसी गैर मर्द के हवाले कैसे कर दूं. जैसे तैसे अपने आप को संभाला और हाथ मुँह ढोने चला गया,

आशा: "भैया, जल्दी से आ जाओ,भूख लगी होगी गरम गरम रोटियाँ सेंक के देती हूँ. आके बैठ जाओ.

हरिया: "आता हूँ दीदी, आता हूँ "

हरिया आके बैठ गया, आशा रोटियाँ बेलने लगी, आशा ने अपना आँचल कुछ इश्स तरह से ढाका था के उसके दोनो ममममे आधे से ज़्यादा दिखाई दे रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो जैसे चोली फाड़के बहार आजाएँगे. हरिया घूर घूर किए आशा के मम्मों के तरफ देख रहा था, उसका लंड उसकी चड्डी में तंन के लोहा हो गया था. जी में तो आ रहा था के उसके मॅमन को दबोच कर नोच खाए , उसे समझ नहीं आ रहा था अपने जज़्बातों को कैसे रोके. तभी अचानक रोटियाँ सेंकते हुए आशा का हाथ तवे को जेया लगा. आशा हल्के से चिल्लाई,

हरिया: दीदी क्या हुआ दीदी, हाथ जला क्या"

आशा: "नहीं भैया, ज़रा सा हाथ तवे को लग गया था."

हरिया: "लगता है तवा कुच्छ ज़्यादा ही गरम हो गया है"

आशा ने हल्के से मुक्कुराते हुए कहा; "हां रे तवा सचमुच बहुत गरम हो गया है."

इश्स बात में आशा का मतलब कुच्छ और था, हरिया को भी मतलब सा,माझ आया लेकिन सोचा आशा शायद सचमुच ही तवे की बात कर रही हैं.

आशा चूल्‍हे के सामने बैठ के पसीने से भीग गयी थी, उसके पसीने की खुश्बू भी अब हरिया को पागल कर रही थी, उसके बगल बिकुल भीग गये थे, उसने दो टीन बार देखा था के आशा के बगलों में थोड़े बहुत बॉल हैं, उसे बहुत इच्छा हुई आशा के बगलिन का पसीना चाटने की, मगर हू बेबस था. वो चुप छाप रोटी खाने लगा.

आशा: "कैसी बनी है रे रोटियाँ , सब्जी कैसी है"

हरिया: "बहुत अच्छी बनी हैं रोटियाँ, और सब्ज़ी भी मस्त है, मगर दीदी तुम तो पसीन से भीग गयी हो, ज़रा फन के नीचे बैठकर आराम कर लो, मैं तब तक यह दो रोटी ख़ाता हूँ."

आशा ने फिर दूसरा तीर छ्चोड़ा, ज़रा सा अपनी टाँगें फैला कर बोली: "हां रे मैं तो पूरी भीग गयी हूँ, मेरा तो सब कुच्छ भीग गया है"

अब तो हरिया को भी शक़ुए होने आगा के आशा जान बूझके ऐसी बातें तो नहीं कर रही.

अब हरिया भी कुच्छ कम नाह्न था, अब हू भी दोहरे अर्थ की बातें करने लगा

हरिया: "दीदी अगर भीग गयी हो तो क्या मैं सूखा दूं?"

आशा: "तू सूखा सकता है मुझे?"

हरिया : "हाँ दीदी मैं बहुत अच्छे से सूखा सकता हूँ?"

आशा: "क्या पहले किसी लड़की को सूखाया है?"

हरिया: "नहीं अब तक तो किसी लड़की को नहीं सूखाया लेकिन कैसे सुखाते हैं यह मालूम है, ट्राइ करने में क्या जाता है."

आशा को बहुत मज़ा आने लगा, पहली बार किसी मर्द से ऐसी मज़ेदार बातें कर रही थी.

आशा: "अच्छा बता तो कैसे सुखाते हैं लड़की को?"

हरिया: "अब मुँह से नहीं बता सकता, यह तो दिखना पड़ता है."

आशा: "ठीक है तो तू जल्दी से खाना खा ले, मैं भी अपना काम ख़तम करके आती हूँ, फिर टV के पास बैठकर खूब बातें करेंगे , चल जल्दी से खले."हरिया ने अपना खाना ख़तम किया और जाके टV के सामने बैठ गया, आशा भी 10-15 मीं में अपना काम ख़तम करके हरिया के पास आके बैठ गयि.खुछ देर तक तो दोनो ने कुच्छ नहीं कहा, लेकिन यह खामोशी आशा की जान ले रही थी, तो उसने ही बात च्छेद दी.

आशा: "हां हरिया बता तो क्या बोल रहा था वहाँ चूल्‍हे के पास?"

हरिया: "मैं क्या बोल रहा था ,तुम ही पता नहीं कुच्छ सूखने की बातें कर रही थी."

आशा: "तू ही तो बता रहा था के जब कोई लड़की भीग जाती है तो तू उसे सूखा सकता है."

हरिया: "हां मैने सुना है के जब एक लड़की भीग जाती है तो लड़के उसे कैसे सुखाते हैं."

आशा: "भैया पहले यह तो बता, की लड़की के पास ऐसी कौनसी चीज़ है जो भीग जाती है और सिर्फ़ लड़के ही उसे सूखा सकते हैं."

हरिया अब पागल हो रहा था, उसकी दीदी अब सेधे सीधे उसके लंड पर वार कर रही थी. उसका लॉडा अपनी बहें आशा के मुँह से ऐसी बातें सुनके तंन रहा था. मगर अपनी टाँगों से उसे छुपाने की कोशिश कर रहा था.

हरिया: "दीदी तुम तो सब जानती हो, फिर क्यूँ अंजान बन रही हो."

आशा: "अरे मैं तोहसाब जानती हूँ, मगर मैं अपने छ्होटे भाई के मुँह से सुन ना चाहती हूँ, शर्मा मत बता ना."

हरिया: "अरे वोही चीज़ दीदी जो लड़कियों के टाँगों के बीच में होती है."

आशा: "अरे सीधे सीधे बता ना क्या कहते हैं उसे , अपने दोस्तों के
साथ तो बड़ी गंदी गंदी बातें कर ता है और अपनी बहें के सामने शरमाता है, मुझे भी अपना दोस्त समझ भैया, चल बता ना क्या कहजते हैं उस चीज़ को एक लड़की की टाँगों के बीच होती है जो हमेशा भीगी रहती है और सिर्फ़ एक लड़का ही उसे सूखा सकता है."

हरिया : "दीदी उस चीज़ को चूत कहते हैं"

आशा: "हाय हाय कितना अच्छा लगा आपे छ्होटे के भाई के मुँह से "छूट" शब्द सुनकर" कहते हुए आशा ने हरिया का माता चूम लिया, चूमते चूमते उसने अपने गोल गोल मम्मे हरिया की च्चती से चिपका दिए. हरिया के जिस्म में तो करेंट दौड़ने लगा. हमेशा लड़कियों के मम्मे, चूत सोचने वाला हरिया एकद्ूम से इश्स जवानी की बहार को अपनी बाहों में पाकर खुशी से झूम उठा.

तभी टV पर गाना आ रहा था ,"चोली के पीछे क्या है, चोली के पीछे". मधुरी का डॅन्स ग़ज़ब का सेक्सी था,

आशा: "हरिया कभी देखा है एक लड़की के चोली के पीछे क्या है."

हरिया: "कभी हक़ीक़त में तो नहीं देखा पर हां किताबों और फिल्मों में देखा है."

आशा: "बता तुझे कैसी लगती हैं एक लड़की के चोली के अंदर का माल??"

हरिया: "कमाल है दीदी, भगवान ने लड़कियों को क्या ग़ज़ब की चीज़ दी है मम्मे,देखो कैसे वहाँ मधुरी अपने मॅमन को झटका दे दे के उठा रही है, जैसे हम लोगों से कह रही हो आओ और आके मेरे मॅमन को नोच डालो. कोई भी लड़का फिदा हो जाएगा अगर एक लड़की अपने मॅमन का माल उसे दिखा देगी तो."

आशा: "ऐसा क्या, तू तो बहुत सयाना हो गया है, क्या मेरे कबूतर भी मधुरी के जैसे गोल गोल और रसीकले हैं??"

हरिया: "दीदी तुम्हारे कबूतरों के तो क्या कहने, जी में तो आता है के तुम्हारी चोली फाड़कर एक एक मम्मे को मुँह में लेके घंटों चूसून, खूब दब्औन और खूब खेलूँ उनके साथ. मेरे दोस्त तो तुम्हारी इन कबूतरों के पीछे दीवाने हैं."आशा को खूब नशा चाड़ने लगा जवानी का, पुर रंग में आ गयी थी अब आशा, अब तो चुदाई किए बगैर वो हरिया को छ्चोड़ने ही नहीं वाली थी. इसीलये उसने हरिया को और गरम करना चाहा.

आशा: "बता क्या कहते हैं मेरे मॅमन के बारे में तुम्हारे दोस्त?"

हरिया: "असलम सबसे बड़ा दीवाना है तेरा दीदी, वो तेरे मॅमन के बीच में लॉडा डाल के छोड़ना चाहता है, फिर तेरे इन मॅमन को अपने लॉड के पानी से पूरा भीगा देना चाहता है और बहुत से गंदे गंदे ख़याल आते हैं उसके मॅन में तेरे बारे में"

आशा: "बता नेया और क्या क्या बातें करते हो तुम लोग मेरे बारे में"

हरिया: "दीदी बहुत गंदी बातें हैं दीदी, तुम बुरा मान जाओगी"

आशा: "अरे मैं बुरा नहीं मानूँगी रे भैया, बता ना जल्दी मुझे अच्छा लगेगा."

हरिया: "आशा दीदी वो असलम है ना, वो तो तुम्हारे लिए कुच्छ भी कर सकता है, वो तुम्हारी चूत छत ना चाहता है, तुम्हारी चूत का सारा रस पीना चाहता है, फिर तुम्हें खूब छोड़ना चाहता है, वो तुम्हें अपने बच्चों की मया बनाना चाहता है, और फिर वो तुम्हारी गांद सूंघना चाहता है, कहता है "हरिया तेरी बहें आशा की गांद की बदबू कितनी मस्त होगी, काश एक बार उसकी गांद में नाक डालने को मिल जाए बस" ,और और..."

आशा: "और क्या बता ना, रुक क्यूँ गया..?"

हरिया: "वो तुम्हारी रसीली चूत से मूट पीना चाहता है दीदी"

आशा: "हाय क्या गंदे दोस्त हैं तुम्हारे हरिया"

हरिया: "और तो और दीदी वो तुमसे भी गंदे गंदे काम करवाना चाहता है, कहता है वो तुमसे अपना लॉडा चुस्वाएगा, अपने लॉड का पानी पिलाएगा, तुमसे अपनी गांद चटवाएगा और पता नहीं क्या क्या..??"

आशा: "जब तेरे दोस्त यह सब गंदी गंदी बातें मेरे बारे में कर रहे थे तो तुझे बुरा नहीं लगा?"

हरिया: "नहीं दीदी क्यूँ के मुझे भी यह सब तुम्हारे साथ करने की बहुत तमन्ना थी, मैं भी उन लोगों के साथ मिलकर तुम्हें छोड़ने के सपने देखता था."

आशा: "तो तू भी मेरे साथ यह सब गंदी गंदी चीज़ें करना चटा है.."

हरिया: "हां दीदी, मैं तो खुशी से पागल हो जौंगा गर तुमने मुझे अपने साथ यह सब करने का मौका दिया तो!!"

आशा: तो चल हरिया आज मैं तेरे दिल की हर तमन्ना पूरी करने को तैयार हूँ, आजा मेरे होंठों को चूम ले"

हरिया का दिल खुशी के मारे उच्छल पड़ा , हरिया आशा के होंठ चूमने के लिए आयेज बढ़ा आशा भी अपने भाई को चूमे के लिए अपने होंठ हरिया के होंठ के करीब लाई, होंठों ने होंठों का स्पर्श किया ही था के तभी किसी ने दरवाज़े पे दस्तक दिया. आशा और हरिया को बहुत गुस्सा आया के कौन आगेया इस वक़्त कबाब में हड्डी बनकर, अपू के आने में तो अभी घंटा था, इश्स वक़्त कौन आ टपका. आशा ने जाकर दरवाज़ा खोला, देखा तो सामने असलम था, आशा ज़रा सा झुकी हुई थी और असलम को आशा के आधे से ज़्यादा कबूतर नीचे की तरफ लटके हुए दिखाई दे रहे थे. असलम के दिल में तो आया के वो आशा का वहीं बलात्कार कर दे मगर किसी तरह अपने आप को रोक कर कहा , "दीदी , हरिया है? ज़रा ज़रूरी काम था." आशा ने देखा के हरिया की नज़रें उसकी चोली को चियर के उसके मॅमन को आँखों से चोद रही तीन, आशा ने एक शरारत बहरे मुस्कुराहट के साथ कहा, "बैठो असलम अभी बुलाती हूँ."

हरिया: "क्या बात है असलम, तू इश्स वक़्त??"

असलम: "अरे हरिया,कल शहेर में मिनिस्टर साब आरहे हैं और वहाँ उनके स्वागत की पूरी ज़िम्मेदारी हमें मिली है,बस एक रात का काम है, कल सुबह तक लौट आएँगे, और सुन अगर काम अच्छा किया तो सिर्फ़ एक रात में 200 रुपये तक कमा सकते हैं. ज़्यादा सोच मत और चल अभी मेरे साथ."

हरिया बहुत निराश हुआ, आशा के साथ वक़्त बिताने का यह एक जो मौंका मिला था अब वो भी गया, उसने उदास मॅन से आशा की तरफ देखा, वो भी उदास हो गयी थी. हरिया ने असलम से कहा "तू चल मैं बस अभी 10 मीं में आता हूँ." असलम चला गया.

आशा : "कोई बात नहीं भैया, आज की रात मैं खुद को संभाल लूँगी, और तो और कल से तो हुमारा राज है, कोई रोकने वाला नहीं, आज अगर तुम जाओगे तो 200रुपये मिलेंगे जिस से घर को बहुत मदद ,इलेगी, तू जेया , हम कल मज़ा करेंगे तू जेया आज."

हरिया: "ठीक है दीदी अगर तुम कहती हो तो मैं जाता हूँ, मगर कल तक पता नहीं कैसे सबर कर पौँगा."

आशा: "कोई बात नहीं कर लेंगे, कल का दिन हमारे ज़िंदगी का सबसे अच्छा दिन होगा, यह सोच कर आज की रात गुज़र लेंगे भैया."

एक गाँव की कहानी पार्ट ०६

आशा ने कहा, "तैयार हो कर आजओ मैने हलवा पूरी बनाई है तुम्हारे लिए, आकर खा लो"

सुरिंदर: "हां आशा अभी आया, कपड़े पहेंकर."

सुरिंदर कपड़े पहें के आकर खाने के लिए बैठ गया, आशा को बापू बहुत स्मार्ट और सुंदर अच्छा लग रहा था .

आशा: "बापू आज तुम बहुत अच्छे दिख रहे हो.."

बापू: "क्या एक जवान लड़की को मेरे जैसा 42 साल का बुद्धा अच्छा लग रहा है"

आशा: "अपने आप को बुद्धा मत कहो बापू, तुम आज भी बहुत मस्त लगते हो एक दूं फिल्मोंवले अनिल केपर की तरह."

सुरिंदर को बहुत अच्छा लगा के एक जवान लड़की उसकी तारीफ कर रही है, वो हल्के से मुस्कुरा कर रह गया.

फिर सुरिंदर ने खाने को देखते हुए कहा, "सुबह सुबह इतना सब कुछ बनाने की क्या ज़रूरत थी बेटी?"

आशा ने प्यार से कहा, "खा लो ना बापू, कल रात में भी तुमने खाना नहीं खाया था, इसीलिए गरम गरम हलवा पूरी बनाई है."

सुरिंदर ने खाते हुए कहा, "आ क्या मस्त स्वाद है तेरा एररर, मेरा मतलब है हलवे का, मज़ा आगेया."

आशा: "और "दूं" क्या बापू ??"

सुरिंदर: "जितना है सारा चाट खजौंगा.."

आशा अब और झुक झुक के अपने मामए का ज़ोरदार प्रदर्शन करते हुए परोसने लगी. सुरिंदर भी अपनी भरपूर जवान बेटी को आँखों से चोद रहा था, उसका मज़ा ले रहा थ.तभि आशा ने अपने एक और हत्यार का प्रयोग किया. हल्के से उसने एक धीमी मगर बहुत ही बदबूदार पाद अपनी गांद से निकली. आशा उस बदबू का अपने बापू के नाक तक पहुँचने का इंतेज़ार कर रही थी. तभी अचानक बापू ने ज़ोर से कहा, "वाआह क्या खुश्बू है!!"

आशा हैरान हो गयी बापू तो खुल्लम खुल्ला उसकी पाद की तारीफ कर रहे हैं मगर फिर बापू ने कहा, "वाह क्या स्वाद है आशा तुम्हारे हलवे का, कमाल की बनाई है तुमने यह हलवा बेटी."

आशा ने मॅन ही मॅन कहा : "अच्छा तो बापू हलवे की बात कर रहें हैं, मैं तो सोची बापू मेरी पाद के बारे में बात कर रहे हैं."

मगर सच तो यह था के सुरिंदर आशा के पाद की ही तारीफ कर रहा था.. उसकी बदबू उसे बहुत मस्त कर रही थी, एक जवान गांद की पाद की महक उसे हवस से पागल कर रही थी.

सुरिंदर ने कहा, "लगता है बहुत मेहनत से बनाई है यह हलवा तुमने.."
आशा ने सोचा, "बापू अगर तुम मेरी गांद का असली हलवा खाओगे ना , इस मामूली से हलवे को भूल जाओगे"

आशा ने कहा, "हां बापू , एक रात की तैयारी लगी है इसे बनाने में." (आशा का मतलब कुच्छ और था)

सुरिंदर भी दोहरे अर्थ में बात करने लगा, "तभी जाकर इतनी अच्छी खुश्बू आ रही है, वाह क्या खुश्बू है तेरे हलवे का आशा कसम से बहुत हलवा खाया है मगर ऐसी खुश्बू किसी भी हलवे में नहीं थी. जी में आता है के इसकी खुश्बू ज़िंदगी भर सूंघटा रहूं"

आशा ने मॅन ही मॅन कहा, "एक बार हां तो कहो बापू पूरा का पूरा हलवा खिला दूँगी.."

आशा: "तुम्हें मेरे हलवे की खुश्बू अच्छी लगी ,यही मेरे लिए बड़ी बात है."

सुरिंदर ने बड़े चाव से सारा हलवा पूरी खाया, शायद आशा के पाद की महक ने उसकी भूख बड़ा दी थी.

खाने के बाद सुरिंदर उठा और काम पर जाने की तैयारी में लग गया.
तभी आशा ने पूच डाला, "शहेर में उमा बुआ की क्या तबीयत है?"

सुरिंदर को एक झटका लगा के आशा को अचानक उमा की क्यूँ सूझी उसने बात को टालते हुए कहा, "पता नहीं कैसी है, बहुत दिन हो गये उसे मिले हुए, भारी जवानी में विधवा हो गयी है अभी उमर ही क्या है उसकी बस 29 साल, अब पता नहीं कैसे गुज़ारा कर रही है, मेरी इतनी औकाड भी नहीं है के मैं जाके उसकी कुच्छ मदद करूँ."

आशा ने मॅन ही मान कहा, "बापू क्या सफेद झूट बोलते हो, अभी कल रात को ही तुम उमा बुआ की संडास से भारी गांद छोड़के आए हो और कहते हो बहुत दिन हो गये उमा से मिले हुए, सेयेल बहेनचोड़ इतना झूट, तुझे बहुत जल्द बेटी चोद नहीं बनाय तो देख मैं भी एक बहेनचोड़ की बेटी नहीं."

बापू: "तुझे अचनका उमा की याद कैसे आगाय?"

आशा: "पता नहीं मुझे क्यूँ ऐसा लगा के कल रात तुम उमा बुआ से मिलके आए हो!!"

सुरिंदर सकपका गया और बात को टालने लगा, "तुझे भी अजीब अजीब ख़याल आते हैं"

तभी अचानक से आशा ने फिर एक बार धमाकेदार पाद छ्चोड़ा मगर इश्स बार जान बूझके नहीं था, गांद में जो टट्टी भारी थी उसने अपना असर दिखना शुरू कर दिया था. आशा अचानक से निकले इस पाद पर हैरान हुई और बापू की तरफ देखा जो आशा की पाद सूंघने में व्यस्त था.

बापू": "क्या आशा तुम आज संडास करने खेतों में नहीं गयी, बहुत पाद छ्चोड़ रही हो, ऐसे अपने बापू के सामने पाद छ्चोड़ना अच्छी बात नहीं है."

आशा ने सोचा: "साला बहेनचोड़, खाते वक़्त मेरे पादों की बाज़ का मज़ा ले रहा था, मेरा हलवा खाने की बातें कर रहा था और अब कहता पाद छ्चोड़ना सभ्या लोगों का काम नहीं है, अब देख मैं कैसे अपनी बातों से तुझे अपना दीवाना बनाकर मज़ा चकाहती हूँ."

आशा: "हां बापू आज मैं नहीं गयी क्यूंकी घर में काम इतना था, सोचा तुम्हारे लिए हलवा पूरी बना लूँ फिर चली जौंगी. और वैसे भी जब मैं टट्टी करने जाती हूँ, गाओं के सारे लड़के मेरे पीछे पीछे चले आते हैं, आकर मुझे संडास करते हुए देखते हैं, बहुत शरम आती है बापू, कल तो एक च्छिच्चोरे ने पीछे से आकर मेरी गांद में उंगली करनी शुरू कर दी और मैं उसे रोक भी नहीं पाई क्यूंकी इतना अच्छा लग रहा था उसकी उनली मेरे गांद में के मैं अपने आप को भूल गयी, फिर जब होश में आई तो वहाँ कोई नहीं था. लेकिन इतना मज़ा आया के मैं बता नहीं सकती, मॅन बहकने लगा था. कुच्छ ऊँच नीच ना हो जाए इसी दर्र से आज से मैने खेतों में संडास जाना बंद कर दिया है. यहीं घर के पीचवाड़े बैठ जौंगी."

बस अब तो सुरिंदर पागल हो गया था, यह उसकी बेटी कैसी बातें कर रही है, आशा की बातों का असर सीधे उसके लॉड पर हो रहा था. अब उस से रहा नहीं जेया रहा था, जी में तो आया के आशा को पलटाके, उसका ल़हेंगा उठाके गांद में से सारी टट्टी चूस लून मगर वो अभी रुकना चाह रहा था. अपने और अपने लंड को काबू करके बोला, "हां हां ठीक किया तूने, कहीं कुच्छ गड़बड़ हो गयी तो गाँव में मैं मुँह दिखाने लायक नहीं रहूँगा."

आशा ने सोचा: "वाह रे रांड़ के जाने, शहेर जाके तू अपनी सग़ी बहें की गांद छोड़ता है और यहाँ इज़्ज़त की बात करता है."

सुरिंदर: "जब तक मैं बीड़ी पीलून तू पिछवाड़े जाके हॅग के आजा, मैं बैठता हूँ."

आशा ने सोचा: "अच्छा तो आज बापू मुझे हागते हुए देखना चाहता है, ठीक है अब ऐसा नज़ारा दिखती हूँ के साला लंड में से फव्वारे च्छुटेंगे."

आशा: "अच्छा बापू तुम बैठो, मैं ज़रा हॅग के आती हूँ."
और आशा घर के पीछे संडास करने चली गयी, सुरिंदर खिड़की के पास बैठ कर आशा को संडास करते हुए देख रहा था. आशा ने ल़हेंगा उठाया तो सुरिंदर ने देखा आशा ने तो कच्ची ही नहीं पहनी, सोचा साली क्या चिनार है बिना कच्ची के घूमती है, आशा खिड़की की तरफ गांद कर के बैठ गयी हॅगने, सुरिंदर ने अपना लॉडा निकाला और आशा की गांद को देखते हुए मुत्ह मारने लगा, आशा सब जानती थी के पीछे से उसका बापू उसे देख रह है, आशा पहले अपनी गांद में उंगली डालके हिलने लगी, थोड़ी देर बाद उंगली निकाल ली, और फिर धीरे धीरे गांद में से बड़े बड़े टुकड़े गू के निकालने लगे, सूरज की रोशनी में चमकते हुए पीले पीले से टुकड़े बहुत ही प्यारे और मस्त लग रहे थे. एक पे एक , एक पे एक, एक पे एक ऐसे टुकड़े निकलते ही जा रहे थे और एक छ्होटा सा पहाड़ जैसे बन गये थे. फिर थोड़ी देर बाद आशा ने वैसे ही ल़हेंगा उठाए हुए पानी लेने गयी और बैठके अपनी गांद ढोने लगी. आशा के हाथ पे उसकी गांद की बदबू खूब लग गयी थी. आशा ने खिड़की की तरफ देखना चाहा मगर नहीं देखा. फिर ल़हेंगे को नीचे करके कमरे में आगाय. सुरिंदर अंजान बन ने का नाटक करते हुए बीड़ी पी रहा था.

आशा : "हां बापू कर आई संडास मैं, पेट हल्का हो गया वरण ना जाने और कितने पाद निकलते!!"

बापू: "मगर तू ऐसे ही घर में हागती रही , कहीं घर गंदा ना हो जाए."
आशा ने सोचा: "पता नहीं बापू इतना शरीफ बन ने का नाटक क्यूँ करता है, अगर मौका मिले तो यह मेरी गांद के नीचे बैठके मेरी सारी टट्टी खा जाए, साला चिनार की पैदाइश, अभी देख मैं मिया बोलती हूँ"

आशा: "नहीं बापू कुच्छ गंदा नहीं होगा, वो हमारा कुत्ता है ना, उसे मेरी टट्टी बहुत पसंद है, काई बार उसने मेरी टट्टी खाई है, बड़े चाव से ख़ाता है मेरा संडास, ठीक वैसे ही जैसे तुम अभी वहाँ मेरा बनाया हलवा खा रहे थे, अरे , यह भी तो मेरा बनाया हुआ ही हलवा है ना, वो हाथ से बनाया तुमने खाया, यह गांद से बनाया कुत्ते ने खा लिया. "

सुरिंदर को अब कुच्छ कहने को रहा ही नहीं, आशा ऐसी ऐसी बातें कर रही थी के उसका लॉडा गरम लोहे की तरह धोती में सुराख कर के बहार आने को था,उसे लगा "मुझसे अच्छी किस्मत तो उस कुत्ते की है जो अहसा की टट्टी खा सकता है,काश थोड़ी देर के लिए वो भी कुत्ता बन जाता ,तो वो भी आशा की टट्टी का स्वाद तो चख सकता."सुरिंदर को अपना जीभ होंठों पे फेरता देख आशा ने तपाक से पूच लिया, "बापू अभी भी भूख है, चलो मैं अपना हलवा खिलती हूँ अभीत्ोड़ा बचा है"

बापू: "कहाँ??"

आशा: "रसोई में, तुमने क्या समझा??"

बापू: "कुच्छ नहीं , पेट भर गया है तुम्हारे हलवे से."

अब उसे काम के लिए देर हो रही थी और वो यह सोच के चुप रह गया के आज वो शाम को सीधे घर जाएगा और आशा को छोड़ने की कोशिश करेगा.

बापू: "अच्छा आशा चलता हूँ, आज शाम को घर जल्दी आज़ौंगा"

आशा: "अरे बापू यह तुम्हारे नाक के पास क्या लगा है, लो मैं अपने हाथों से पोंछ देती हूँ" यह कहते हुए आशा ने अपने संडास की बदबू वाले हाथों से सुरिंदर का नाक पोंछने लगी. आशा खुद अपने हाथों से सुरिंदर की नाक में अपनी गरमा गरम टट्टी की खुश्बू सूँघा रही थी और अब तो हाढ़ हो गयी परीक्षा की ,सुरिंदर के लंड ने कच्चे में ही पानी छ्चोड़ दिय.शुरिन्देर सीधे बाथरूम में गया लंड को धोया,आशा ने सब देखा और खुश हो गयी, उसकी और भाभी के नुक्के काम कर रहे थे, अब वो पल ज़्यादा डोर नहीं जब इश्स घर मेनचुदाई का नंगा नाच होगा. सुरिंदर काम के लिए निकल गया.

सुबह के 10 बजे थे, अभी हरिया उठा नहीं था. अब आशा ने अपना रुख़ हरिया की तरफ किया. और उसे उठाने आँगन में चली गयि.आश को हरिया को उठाने के लिए एक शरारत सूझी, उसने अपने संडास की बदबू वाले हाथों को हरिया की नाक के पास रख दिया. हरिया जो गहरी गहरी साँसें भर रहा था, अचानक से अपनी नाक में एक अजीब सी बदबू को सूँघर उठ गया, आँखें खोल कर देखता है तो आशा , एक खूबसूरत मुस्कुराहट के साथ उसके साथ पास बैठी थी. इतनी खूबसूरत लग रही थी आज हरिया को अपनी बहें, उसकी छाती फूल कर उसकी चोली से बहार आ रहे थे, कमर ललचा रही थी. हरिया तो बस अब अपनी बहें का दीवाना हो गया था, उसे ज़िंदगी में और कुच्छ नहीं बस उसकी बहें चाहिए थी.

हरिया: "दीदी, यह कैसी बदबू है , जानी पहचानी है मगर फिर भी याद नहीं आरहा है."

आशा: "बताओ, कहाँ की बू है यह., देखती हून तुम अपनी बहें को कितना जानते हो."

हरिया: "कहीं यह तुम्हारी..????"

आशा ने हंसते हुए आँख मारी और कहा: "लगता है याद आगाय के कहाँ की बू है." कहते हुए वो उठ के भाग गयी."

हरिया: "क्या चिनार हो दीदी तुम भी, अपने गांद की बदबू सूँघाके मुझे उठती है ठहेर रुक जेया, अभी तुझे मज़ा चखता हूँ."

आशा आँगन में हरिया से बचने के लिए भाग रही थी, हरिया उसके पीछे पीछे दौड़ रहा था, "रुक जाओ दीदी, रुक जाओ"

आशा जब दौड़ रही थी तो उसके मम्मे उसकी चोली से अंदर बहार हो रहे थे, उसकी गांद के गोल गोल छूटर हिल रहे थे, ऐसा नज़ारा अपनी आँखों के सामने हरिया पहली बार देख रहा था. सुबह सुबह उसका लॉडा वैसे ही तंन जाता था, आज तो उसकी बहें की गांद की बदबू और उसपर ऐसा नज़ारा , उसका लॉडा लोहा हो गया था.

आशा: "पकड़ के दिखाओ तो जानू."

हरिया: "क्या पाकडूं बता?"

आशा: "मेरा कुच्छ भी पकड़ के बता, देखती हूँ."

फिर हरिया ने आख़िर उसे पीछे से आकर पकड़ ही लिया, आशा के मम्मे हरिया के मजबूत बाहों में मसल रही थी और उसे बहुत मज़ा आ रहा था. "आअहह अच्छा लग रहा है भैया. आअहह और मस्लो भैया,म्‍म्म्मम"
फिर कुच्छ देर बाद हरिया ने उसे छ्चोड़ा.

आशा: "कल भैया जो काम अधूरा रह गया था आज उसे पूरा कर लो भैया, आओ चूम लो मुझे"

हरिया: "यहाँ आँगन में दीदी, यहाँ तो कोई भी हमें देख लेगा दीदी."

आशा: "देखने दो, अब मुझे किसीसे नहीं डरना है, मैं सब के सामने अपने भैया से मज़े लेना चाहती हून. मैं तुम्हारी रांड़ बन के रहूंगी भैया, तुम मुझे कहीं भी किसिके सामने भी कुच्छ भी कर सकते हो. मैं तुम्हें कुच्छ नहीं कहूँगी."

हरिया: "दीदी तुम तो बड़ी हरामी हो, आजाओ , आज तुम्हारा भाई सब के सामने तुम्हारा मुँह चूमता है और तुम्हें अपनी रांड़ घोषित करता है. "

और फिर हरिया आशा के मुँह से अपना मुँह भिड़ा देता है और आशा के होंठ चूमने लगता है.

आशा: "मेरे होंठ एक एक करके चूसो भैया, बहुत मज़ा आएगा तुम्हें भी और मुझे भी!!!"

हरिया आशा के दोनो होंठ एक एक करके चूस रहा था, ऐसा बस उसने फिल्मों में देखा था सोचा ही नहीं था के इतनी जल्दी किसी के साथ यह सब करने का मौका मिलेगा और वो भी अपनी सग़ी बहें के साथ.वोह अपनी खुश किस्मती पर इतरा रहा था.

आशा: "अब अपनी जीभ मेरे मुँह के अंदर डालो भैया और छात्लो मेरे मुँह के अंदर का सारा माल, बहुत अच्छा लग रहा है भैया"

हरिया आशा के कहने पर अपना जीभ आशा के मुँह के अंदर डाल कर उसके सारा मुँह टटोलने लगा, फिर वो आशा की थूक को चाटने लगा, बड़ा ही स्वादिष्ट लग रही थी उसे आशा की थूक.

इतने में गाओं की कुच्छ औरतें वहाँ से गुज़र रही थी, उन्होने देखा आशा और हरिया खुलेआम चुम्मा छाती कर रहे थे. यह देखकर वो एकदुसरे से कहने लगी, "क्या ज़माना आ गया है, देखो कैसे यह चिनार साली अपने ही भाई से चुम्मा छाती कर रही है वो भीॉ खुले आम, शरम नाम की कोई चीज़ ही नहीं है."

फिर एक ने आशा से कहा, "क्यूँ री आशा, तेरी सारी शरम हया मार गयी है क्या, जो ऐसे घिनोने काम कर रही है, अपने ही भाई से मुँह चुस्वा रही है, पाप कर रही है तू, अगर चुदाई के लिए चूत इतनी ही खुज़ला रही है तो गाओं में किसी भी मारद के नीचे सो जाती, अपने ही भाई से करवाने में तुझे शरम नहीं आई."

फिर आशा ने भी करारा जवाब दिया," छिनालों, तुम्हें क्या मैं अपने घर में अपने भाई के साथ कुच्छ भी करूँ तुम्हारी गांद में खुजली क्यूँ हो रही है, मैं अपने भैया की रंडी हूँ,मैं अपने भाई से मुँह चूस्वौनगी, चूत चूस्वौनगी और गांद भी चूस्वौनगी, इतना ही उसका लॉडा चूस कर गांद और चूत मार्व्ौनगी , और अगर हुआ तो अपने बाप से भी चड़वौनगी, तुम लोग अपनी चूत के बारे में सोचो और फिर मेरे घर में ताक झाँक मत करो, चल निकलो त्याहाँ से."

चुपचाप सारी औरतें निकल ली वहाँ से.

हरिया हैरान हो कर बोला: "आशा यह तूने क्या किया, सब के सामने ऐसा कहने की क्या ज़रूरत थी, अब तो हम सारे गाओं में बदनाम हो जाएँगे, और तूने बापू के बारे में ऐसा क्यूँ कहा, अगर बापू को पता चला तो वो मेरी और तेरी दोनो की गांद फाड़ देंगे. मुझे अब दर्र लग रहा है."

आशा: "तुझे चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है, अगर बापू ने कुच्छ कहा तो मैं संभाल्लूंगी, तू नहीं जानता बापू भी साला बहुत बड़ा बहेनचोड़ है, तू बस देखता जेया अब कैसे मैं इस घर का सारा माहौल बदल देती हून. तू बस अब जो हो रहा है उसे होने दो,आ अब मुझे तेरे होंठ चूसने दे, एक जवान मारद के मुँह का स्वाद देखूं तो कैसा है."

आशा अब धीरे धीरे हरिया के दोनो होंठ एल एक करके चूसने लगती है, फिर हरिया की जीभ को चाट ती है , हरिया तो खुशी से पागल हो रहा था, उसके मज़े की कोई हड्द नहीं थी, हू मदहोश होकर अपना मुँह आशा से चुस्वा रहा था, आशा अपनी जीभ उसके मुँह में डालकर पूरा का पूरा मुँह चटलेटी है.

आशा: "हरिया मेरे मुँह में थूक, उगल दे मेरे मुँह में मुझे तेरे थूक का स्वाआद चखना है"

हरिया तो मानो अपनी आशा दीदी का ग्युलम हो गया था, हरिया ने थेक वैसे ही आशा के मुँह पर और उसके मुँह के अंदर थूक दिया. आशा अपने भाई हरिया का थूक पूरा स्वाद लेलेकर निगल गयी.

आशा:"अब मेरा मुँह चाट ले, मेरे चेहरे का हर इंच चाट ले, मेरे मुँह को अपनी थूक से गीला कर दे और फिर चाट ले"

हराई आशा का मुँह अपने हाथों में लेकर उसका मुँह चाटने लगा, हरिया की थूक से आशा चेहरा पूरा गीला हो गया था. आशा ने हरिया के हाथों को अपने चेहरे से हटाकर अपनी गांद पे रख लिया. "दब्ाओ हरिया मेरे गांद के गोलों को मसल दो अपने हाथों से, खूब मस्लो मेरी गांद को बहुत तदपि है मेरी गांद तेरे हाथों से मसलवाने को, मसल दे मेरे बहेनचोड़ भाई, मसल मेरे नितंबों को."
हरिया आशा को चूमते हुए आशा की भारी भारी गोल गोल गांद को अपनी पूरी ताक़त से मसालने लगा. उसकी ल़हेंगे के उपर से ही उसकी गांद की गली में उंगली डालकर उसकी गांद की च्छेद में घुसाने लगा.

हरिया: "दीदी चलो ना घर के अंदर यहाँ मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, चलो घर के अंदर चल कर बेझिझक चुदाई का खेल खेलते हैं."

आशा को खूब मज़ा आने लगा था मगर वो हरिया को और उकसाना चाहती थी. वो उसे लेकर घर के अंदर चली गयी और दरवाज़ा बंद कर लिया.

























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