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Saturday, April 24, 2010

बदनाम रिश्ते माँ का दुलारा--1


बदनाम रिश्ते
माँ का दुलारा--1

सावधान........... ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक मा बेटे के सेक्स की कहानी है

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी मा का दुलारा ले कर आपके लिए हाजिर हूँ
ये तो हम सभी जानते है की जिंदगी मे इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ सेक्स के बारे मे सोचता है दोस्तो जो इंसान ये कहता है कि वह अपने ईमान का पक्का है तो ग़लत कहता है क्योकि सेक्स तो जीवन का एक रूप है अगर सेक्स नही होता तो शायद ये दुनिया नही होती लेकिन हम इंसानो ने सेक्स की कुछ सीमाए बना दी ताकि इंसान कम से कम अपने घर अपने कुछ रिश्तो को सेक्स की नज़र से ना देखे लेकिन फिर भी हर इंसान बेशक वह सेक्स करे या ना करे लेकिन उसके मन मे अपनी मा या बहन के लिए ग़लत विचार आ ही जाते हैं चाहे थोड़ी देर के लिए ही क्यो ना आए इंसान के मन मे ग़लत भावना आ ही जाती है दोस्तो मे भी मा बहन के लिए सेक्स के बारे सोचना पाप समझता हू लेकिन फिर भी कुछ पारशेंट लोग तो अपने चरित्र से गिर ही जाते है ये कहानी भी एक ऐसे बेटे की है जो अपनी मा का दुलारा था लेकिन जब वो बड़ा हुआ तो............................
.............अब आप ये कहानी उसी की ज़ुबानी सुने ............मेरा नाम अनिल है. घर मे बस मैं और मेरी मोम रीमा है. मोम और डॅडी का बहुत पहले डाइवोर्स हो गया था. उसके बाद डॅडी से हमारा कोई संपर्क नही रहा है. डॅडी दुबाई मे जा बसे है, वाहा उन्होंने दूसरी शादी कर ली है. दाइवोर्स के बाद मैंने मोम के साथ रहने का फ़ैसला किया था. तब मैं सिर्फ़ आठ साल का था. दोनों मे बहुत झगड़ा होता था इसलिए एक तराहा से जब मोम अलग हुई तो मेरी जान मे जान आई. मैं मोम से बहुत प्यार करता था, उसके बिना रहने की कल्पना भी नही कर सकता था.

हमारा घर मुंबई मे है. मोम ने दाइवोर्स के बाद दिल्ली मे नौकरी पकड़. ली और मुझे पूना मे होस्टल मे रख दिया कि मेरी पढ़ाई मे खलल ना हो. मैं काफ़ी रोया चिल्लाया पर मोम के समझाने पर आख़िर मान गया. उसने मुझे बाँहों मे भर कर प्यार से समझाया कि उसे अब नौकरी करना पड़ेगी और एक होस्टल मे रहना होगा. इसलिए यही बेहतर था कि मैं होस्टल मे रहूं. तब हमारा खुद का घर भी नही था और मोम मुझे नानाजी के यहाँ नही रखना चाहती थी. बड़ी स्वाभिमानी है.

पिछले साल मोम ने नौकरी बदल कर यहाँ मुंबई मे नौकरी कर ली. यहाँ उसे अच्छी काफ़ी सैलरि वाली नौकरी मिल गयी. घर भी किराए पर ले लिया. मेरा भी एच.एस.सी पूरा हो गया था इसलिए मोम ने मुझे फिर यहाँ अपने पास बुला लिया की आगे की पढ़.आई यही करूँ.

अब तक मैं साल मे सिर्फ़ दो तीन बार मोम से मिलता था, गरमी और दीवाली की छुट्टी मे.वह सारा समय मज़ा करने मे जाता था. मोम भी नौकरी करती थी इसलिए साथ मे रहना कम ही होता था, बस रविवार को. पिछले एक दो सालों से, ख़ास कर जब से मैंने किशोरावस्था मे कदमा रखा, धीरे धीरे मोम के प्रति मेरा नज़रिया बदलने लगा था. अब मैं उसे एक नारी के रूप मे भी देखने लगा था. होस्टल मे रहकर लड़के बदमाश हो ही जाते हैं. तराहा तराहा की कहानियाँ पढ़ते है और पिक्चर देखते है. मेरे साथ भी यही हुआ. उन कहानियों मे कई मोम बेटे के कहानियाँ होती थीं. बाद.आ मज़ा आता था मैं ज़्यादातर राज शर्मा के ब्लॉग कामुक-कहानियाँ.ब्लॉगस्पोट.कॉम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ता था पर कभी कभी जब मैं मोम और मेरी उन कहानियों जैसी स्थिति मे होने की कल्पना करता था तो पहले तो सब अटपटा लगता था. मोम आख़िर मोम थी, मुझे प्यार करने वाली, मुझपर ममता की वर्षात करने वाली. बहुत अपराधिपन भी महसूस होता था पर मन को कौन पिंजरे मे डाल पाया है.

जब मैं एच.एस.सी के बाद घर रहने वापस आया तो मोम के साथ हरदम रहकर उसके प्रति मेरा आकर्षण चरमा सीमा पर पहुँच गया. मोम अब करीब सैंतीस साल की है. मोम का चेहरा बहुत सुंदर है, कम से कम मेरे लिए तो वा सबसे बड़ी ब्यूटी क्वीन है. शरीर थोड़ा मांसल और मोटा है, जैसा अक्सर इस उमर मे स्त्रियों का होता है, पर फिगर अब भी अच्छा है. मोम रहती एकदमा टिप टाप है. आख़िर एक बड़ी मलतिनेशनल मे आफिसर है. पहले वह ड्रेस और पैंट सूट भी पहनती थी, आजकल हमेशा साड़ी पहनती है. कहती है कि अब इस उमर मे और कुछ अच्छा नही लगता. पर साड़ियाँ एकदमा अच्छी चाइस की होती हैं. चेहरे पर सादा पर मोहक मेकअप करती है ज़रा सी गुलाबी लिपस्टिक भी लगा लेती है जिससे उसके रसीले होंठ गुलाब की कलियों से मोहक लगने लगते है.

जब मैं वापस मोम के साथ रहने आया तब अक्सर दिन भर अकेला रहता था. उसे इतना काम रहता था कि वह अक्सर रात को देर से आती थी. शनिवार को भी जाना पड़.आता था. बस रविवार हम साथ बिताते थे. तब मुझसे खूब गप्पे लगाती, मेरे लिए ख़ास चीज़े बनाती और शामा को मेरे साथ घूमने जाती.

पर अब मैं उससे बात करने मे थोड़ा झिझकने लगा था. मेरी नज़र बार बार उसके मांसल शरीर पर जाती. घर मे वह गाउन पहनती थी और इसलिए तब उसके स्तनों का उभार उस ढीले गाउन मे छिप जाता. पर जब्वह साड़ी पहने होती और उसका पल्लू कभी गिरता तो मेरी नज़र उसके वक्षास्तल के मुलायम उभार पर जाती. उसके ब्लओज़ थोड़ा लो कट है इसलिए स्तनों के बीच की खाई हमेशा दिखती थी. अगर वह झुकती तो मेरे सारे प्राण मेरी आँखों मे सिमट आते, उसके उरजों के बीच की वह गहरी वैली देखने को. वह अगर स्लीवलेस ब्लाउz पहनती तो उसकी गोरी गोरी बाँहे मुझे मंत्रमुग्धा कर देतीं. मोम की कांखे बिलकुल चिकनी थीं, वह उन्हे नियमित शेव करती थी. स्लीवलेस ब्लाउz पहनने के लिए यहा ज़रूरी था. पीछे से साड़ी और ब्लाउz के बीच दिखती उसकी गोरी कमर देखकर मैं दीवाना सा हो जाता. थोड़ा मुटापे के कारण उसकी कमर मे अक्सर हल्के टायर से बन जाते. और मोम की दमकती चिकनी गोरी पीठ, उसपरासे मेरी नज़र नही हटती थी! उसके लो कट के ब्लओज़ मे से उसकी करीब करीब पूरी पीठ दिखती. मोम की त्वचा बहुत अच्छी है, एकदम कोमल और निखरी हुई.

और उसके नितंबों का तो क्या कहना. पहले से ही उसके कूल्हे चौड़े हैं. मुझे याद है कि बहुत पहले जब उसका बदन छरहरा था, तब भी उसके कूल्हे ज़्यादा चौड़े दिखते थे. वह उसपर कई बार झल्लाति भी, क्योंकि उसे लगता कि वह बेडौल लगती है. पर उसे कौन बताए की उन चौड़े कुल्हों के कारण मेरी नज़रों मे वह कितनी सुंदर दिखती थी. ख़ासकर जब वह चलती तो उसे पीछे से देखने को मैं आतुर रहता था. मोटे मोटे तरबूजों जैसे नितंब और बड़े स्वाभाविक तरीके से लहराते हुए; मुझे लगता था कि वही मोम के पीछे बैठ जाउ और अपना चेहरा उनके बीच छुपा दूँ.


और मोम के पाँव. एकदम गोरे और नाज़ुक पाँव थे उसके. मोतिया रंग का नेल पेंट लगी वो पतली नाज़ुक उंगलियाँ और चिकनी मासल एडी. वह चप्पले और सैंडल भी बड़ी फैशनेबल पहनती थी जिससे वो और सुंदर लगते थे. इसलिए मोम के पैर छूने मे मुझे बहुत मज़ा आता था. और ख़ासकर पिछले एक साल से जब मैं होस्टल से आता या वापस जाता, ज़रूर झुककर दोनों हाथों से उसके पैर छूटा, अच्छे से और देर तक; उसे वह अच्छा नही लगता था.

"क्यों पैर छूता है रे मेरे, मैं क्या तेरे नानी हू. बंद कर दे." वह अक्सर झल्लाति पर मैं बाज नही आता था. मन मे कहता

"मॅमी, तू नाराज़ ना हो तो मैं तो तेरे पाँव चुम लूँ." एस डी बर्मन का एक गाना मुझे याद आता, मोम के चरणामृत के बारे मे "... ये चरण तेरे माँ, देवता प्याला लिए, तरसे खड़े माँ!" उस गाने मे मों के प्रति भक्ति है पर मेरे मन मे यहा गाना मीठे नाजायज़ ख़याल उभार देता.

कम से कम यह अच्छा था कि अब मोम मुझे प्यार से अपनी बाँहों मे नही भरती थी जैसा वह बचपन मे करती थी. मैं बड़ा हो गया था. यहा अच्छा ही था क्योंकि अब मोम को देखकर मैं उत्तेजित होने लगा था. जब वह घर का काम करती और उसका ध्यान मेरी ओर नही होता तब मैं उसे मन भर कर घुरता. मेरा लंड तन्नाकार खड़ा हो जाता था. कभी उसके सुंदर चेहरे और रसीले होंठों को देखता, कभी उसके नितंबों को और कभी उसकी पीठ और कमर पर नज़र गढ़ाए रहता. उसके सामने किसी तरह से मैं कंट्रोल कर लेता था पर मौका मिले तो ठीक से घूर कर मैं उसकी मादक सुंदरता का मन ही मन पान करते हुए अपने लंड पर हाथ रखकर सहलाने लगता.

कभी मोम सोफे पर बैठकर सामने की सेती पर पैर रख कर टीवी देखती या कुछ पढ़ती तो मेरा मन झुम उठता क्योंकि अक्सर उसका गाउन सरककर उपर हो जाता और उसके गोरे पैर और मांसल चिकनी पिंडलियाँ दिखाने लगती. मैं भी वही एक किताब लेकर बैठ जाता और उसके पीछे से उन्हे देखता रहता और एक हाथ से अपना लंड सहलाता.

अक्सर मोम पैर पर पैर रखकर एक पैर हिलाती, तो उसकी उंगलियों से लटकी चप्पल हिलने लगती. यहा देखकर तो मैं और मदहोश हो जाता. पहले ही मैं उसके पैरों और चप्पालों का दीवाना था, फिर वह पैर से लटककर नाचती रबर की मुलायम चप्पल देखकर मुझे लगता था कि अभी उसे हाथ मे ले लूँ और चुम लूँ, चबा चबा कर खा जाउ. एक बार मोम ने मुझे अपने पैर की ओर घुरते हुए देख लिया था, तुरंत पैर हिलाना बंद करके देखने लगी कि कुछ लगा है क्या, मैंने बात बना दी कि मोम शायद एक कीड़ा चढ़ा था, उसे देख रहा था.

मोम को पसीना भी ज़्यादा आता था. उसके ब्लओज़ की कांख भीगी रहती थी. वह नज़ारा भी मुझे बहुत उत्तेजित करता था. कई बार मैंने कोशिश की की कपड़े बदलते समय उसे देखु. पर वह हमेशा अपने बेडरूम मे दरवाजा लगाकर ही कपड़े बदलती. सोचती होगी क़ी अब बेटा बड़ा हो गया है.
मैं घर के काम करने मे उसकी खूब मदद करता, जो वह कहती तुरंत भाग कर करता. वह भी मुझ पर खुश थी. मैं परेशान था, आख़िर क्या करूँ, कुछ समझ नही पा रहा था. बीच बीच मे लगता कि मोम के बारे मे ऐसा सोचना पाप है पर उसके मादक आकर्षण के आगे मैं विवश हो गया था. मैं अक्सर यहा भी सोचता की मोम जैसी सुंदर नारी आख़िर अकेले कैसे रहती है, क्या उसे कभी सेक्स की चाहत नही होती? क्या उसका कोई अफेयर है? लगता तो नही था क्योंकि बेचारी आफ़िस से आती तो थॅकी हुई. उसे समय ही कहाँ था कुछ करने के लिए. और घर मे भी अब वह अकेली नही थी, मैं जो था.

रात को और दिन मे भी अकेले मे (कालेज खुलने मे अभी समय था, एडमिशन भी नही हुए थे) उसके रूप को आँखों के सामने को लाकर मैं हस्तमैथुन करता, कल्पना करता की मोम नग्नावस्था मे कैसी लगेगी. मन ही मन अपनी फ़ैंतसी मे उससे तरह तरह की रति करता. मोम को मैं अच्छा लगता हम और वह बड़े अधिकार से मुझसे मन चाहे संभोग करा रही है, यहा मेरी पेट फ़ैंतसी थी.

अब हौसला करके मैंने उसके अंतर्वस्त्रा चुराने शुरू कर दिए थे. उसकी ब्रा और पैंटी मैं चुपचाप उठा लाता और अकेले मे घर मे उनमे लंड लपेट कर मुत्ता मारता. मोम के पास बड़ा अच्छा कलेक्शन था. उनमे से एक लेस वाली सफेद ब्रा और एक नायलाँ की काली ब्रा मेरी ख़ास पसंद की थीं. उन्हे सूँघते हुए मुझे ऐसा लगता जैसे मई मों के आगोश मे उसकी छाती मे सिर छुपाए पद.आ हुआ हम. लंड पर उनका मुलायामा स्पर्श मुझे दीवाना कर देता.

एक दो बार मैं पकड़ा जाता पर बच गया. अक्सर मुत्ता मारने से मेरा वीर्या उनमे लग जाता. तब मैं धो कर दिन मे उन्हे सूखा कर वापस रख देता. एक दिन सुबह मोम परेशान लगी. मैंने पूछा तो बोली कि उसकी काली ब्रा नही मिल रही है. वह काली साड़ी पहन कर आफ़िस जाना चाहती थी. आख़िर झल्ला कर दूसरी साड़ी पहन कर चली गयी. ब्रा मिलती कैसे, रात को मुत्ता मार कर मैंने उस ब्रेसियार को अपने कमरे मे छुपा दिया था. मुझे क्या मालूमा कि आज वह उसे ही पहनेगी! मोम के जाने के बाद उसे धोकर सुखाकर मैंने मोम की अलमारी मे सेडियीओ के बीच छुपा दिया. बाल बाल बचा क्योंकि रात को वापस आकर मोम ने सारी अलमारी ढूँढना शुरू कर दी. जब ब्रा मिली तो वह निश्चिंत हुई. बोली

"अनिल, मैंने भी देखो कहाँ रख दी थी, इसीलिए नही मिल रही थी, मुझे लगा था कि गुम तो नही गयी या बाहर गैलरी से सुखाते समय गिर तो नही गयी."
उसके बाद मैंने उसकी अलमारी से ब्रा चुराना बंद कर दिया. मोम के जाने के बाद धोने को डाली उसकी ब्रा और पैंटी से काम चलाने लगा. यहा और भी मतवाला काम था. उनमे मोम के शरीर की और उसके पसीने की भीनी खुशबू छुपी होती. उसकी पैंटी के क्रेच मे से मोम की चूत की मतवाली महक आती. अब तो मैं मस्त होकर उन्हे मुँहा मे भर लेता और कस कर मूठ मारता. फिर कामवाली बाई आने के पहले उन्हे धोने को रख देता. मेरी दोपहर तो रंगीन हो गयी पर रात को परेशानी होनी लगी.

रात की परेशानी दूर करने के लिए मैंने मोम की चप्पलो का सहारा लेना शुरू कर दिया. जैसा मैंने बताया, मोम के पैर बड़े खूबसूरत हैं. उसके पास सात आठ जोड़ी चप्पले और सैंडल भी हैं, अधिकतर हाई हिल की. रात को मैं मोम के सो जाने के बाद बाहर के शू-रैक से चुपचाप एक जोड़ी उठा लाता. फिर उन्हे लंड से सहलाता, चूमता, चाटता और मूठ मारता. अगर विर्य सैंडल पर छलक जाता तो ठीक से पोंछ कर वापस रख देता. वैसे सबसे अच्छी मुझे मोम की रबर की बाथरुम स्लीपर लगती थी. नाज़ुक सी गुलाबी वा चप्पल जब मोम के पैरों मे देखता और चलते समय होने वाली सपाक सपाक की आवाज़ सुनता जो मोम के तलवं से चप्पल के टकराने से होती थी तो मैं अपना संयम खोने लगता था. दोपहर को वह चप्पल मैं ले आता था पर रात को मोम उसे पहने होती और सोने के बाद उसके बेडरूमा से उन्हे उठाने का मेरा साहस नही था.

इसी चक्कर मे एक दिन आख़िर मैं पकड़.आ गया. एक हिसाब से अच्छा ही हुआ क्योंकि उस घटना ने आख़िर मोम और मेरे बीच की सारी दीवारे हटा दी

क्रमशः......................
दोस्तों पूरी कहानी जानने के लिए नीचे दिए हुए पार्ट जरूर पढ़े .................................
आपका दोस्त
राज शर्मा
माँ का दुलारा पार्ट -1
माँ का दुलारा पार्ट -2
माँ का दुलारा पार्ट -3
माँ का दुलारा पार्ट -4
माँ का दुलारा पार्ट -5
माँ का दुलारा पार्ट -6
माँ का दुलारा पार्ट -7
माँ का दुलारा पार्ट -8
माँ का दुलारा पार्ट -9
माँ का दुलारा पार्ट -10


MAA KAA DULAARA

mera naam anil hai. ghar me bas mai aur meri mom rima hai. mom aur daddy ka bahut pahale divorce ho gaya tha. usake baad daddy se hamara koi sampark nahi raha hai. daddy dubaai me ja base hai, wahaa unhomne dusari shaadi kar li hai. daaivors ke baad maimne mom ke saath rahane ka faisala kiya tha. tab mai sirf aath saal ka tha. donom me bahut jhagad.a hota tha isaliye ek taraha se jab mom alag hui to meri jaan me jaan aayi. mai mom se bahut pyaar karata thaa, usake bina rahane ki kalpana bhi nahi kar sakata tha.

hamaara ghar mumbai me hai. mom ne daaivors ke baad dilli me naukari pakad. li aur mujhe poona me hostal me rakh diya ki meri padhaai me khalal na ho. mai kaafi roya chillaaya par mom ke samajhaane par aakhir maan gaya. usane mujhe baamhom me bhar kar pyaar se samajhaaya ki use ab naukari karana padegi aur ek hostal me rahana hoga. isaliye yahi behatar tha ki mai hostal me rahum. tab hamaara khud ka ghar bhi nahi tha aur mom mujhe naanaaji ke yahaam nahi rakhana chaahati thi. badi swaabhimaani hai.

pichale saal mom ne naukari badal kar yahaam mumbai me naukari kar li. yahaam use achchi kaafi sailari waali naukari mil gayi. ghar bhi kiraaye par le liya. mera bhi H.S.C pura ho gaya tha isaliye mom ne mujhe fir yahaam apane paas bula liya ki aage ki padh.aai yahi karum.

ab tak mai saal me sirf do tin baar mom se milata thaa, garami aur diwaali ki chutti me.wah saara samaya maja karane me jaata tha. mom bhi naukari karati thi isaliye saath me rahana kama hi hota thaa, bas ravivaar ko. pichale ek do saalom se, khaas kar jab se maimne kishoraawastha me kadama rakhaa, dhire dhire mom ke prati mera najariya badalane laga tha. ab mai use ek naari ke rup me bhi dekhane laga tha. hostal me rahakar ladake badamaash ho hi jaate haim. taraha taraha ki kahaaniyaam padhate hai aur pikchar dekhate hai. mere saath bhi yahi hua. un kahaaniyom me kai mom bete ke kahaaniyaam hoti thim. bad.a maja aata tha par kabhi kabhi jab mai mom aur meri un kahaaniyom jaisi sthiti me hone ki kalpana karata tha to pahale to bad.a atapata lagata tha. mom aakhir mom thi, mujhe pyaar karane waali, mujhapar mamata ki warshat karane waali. bahut aparaadhipan bhi mahasus hota tha par man ko kaun pimjare me daal paaya hai.

jab mai ech.es.si ke baad ghar rahane waapas aaya to mom ke saath haradama rahakar usake prati mera aakarshan charama sima par pahumch gaya. mom ab karib saimtis saal ki hai. mom ka chehara bahut sumdar hai, kama se kama mere liye to wah sabase bad.i byuti kwin hai. sharir thod.a maamsal aur mota hai, jaisa aksar is umara me striyom ka hota hai, par figar ab bhi achcha hai. mom rahati ekadama tip taap hai. aakhir ek bad.i maltineshanal me aafisar hai. pahale wah dres aur paimt sut bhi pahanati thi, aajakal hamesha saad.i pahanati hai. kahati hai ki ab is umar me aur kuch achcha nahi lagata. par saad.iyaam ekadama achchi chaais ki hoti haim. chehare par saada par mohak mekap karati hai jara si gulaabi lipastik bhi laga leti hai jisase usake rasile honth gulaab ki kaliyom se mohak lagane lagate hai.

jab mai waapas mom ke saath rahane aaya tab aksar din bhar akela rahata tha. use itana kaam rahata tha ki wah aksar raat ko der se aati thi. shaniwaar ko bhi jaana pad.ata tha. bas raviwaar ham saath bitaate the. tab mujhase khub gappe lagaati, mere liye khaas chije banaati aur shaama ko mere saath ghumane jaati.

par ab mai usase baat karane me thod.a jhijhakane laga tha. meri najar baar baar usake maamsal sharir par jaati. ghar me wah gaaun pahanati thi aur isaliye tab usake stanom ka ubhaar us dhile gaaun me chip jaata. par jabwah saad.i pahane hoti aur usaka pallu kabhi girata to meri najar usake wakshasthal ke mulaayama ubhaar par jaati. usake blaauz thod.e lo kat hai isaliye stanom ke bich ki khaai hamesha dikhati thi. agar wah jhukati to mere saare praan meri aamkhom me simat aate, usake urojom ke bich ki wah gahari vaili dekhane ko. wah agar slivales blaauz pahanati to usaki gori gori baamhe mujhe mamtramugdha kar detim. mom ki kaamkhe bilakul chikani thim, wah unhe niyamit shev karati thi. slivales blaauz pahanane ke liye yaha jaruri tha. piche se saadi aur blaauz ke bich dikhati usaki gori kamar dekhakar mai diwaana sa ho jaata. thod.e mutaape ke kaaran usaki kamar me aksar halke taayar se ban jaate. aur mom ki damakati chikani gori pith, usaparase meri najar nahi hatati thi! usake lo kat ke blaauz me se usaki karib karib puri pith dikhati. mom ki twacha bahut achchi hai, ekadam komal aur nikhari hui.

aur usake nitambom ka to kya kahana. pahale se hi usake kulhe chaud.e haim. mujhe yaad hai ki bahut pahale jab usaka badan charahara thaa, tab bhi usake kulhe jyaada chaud.e dikhate the. wah usapar kai baar jhallaati bhi, kyomki use lagata ki wah bedaul lagati hai. par use kaun bataaye ki un chaud.e kulhom ke kaaran meri najarom me wah kitani sumdar dikhati thi. khaasakar jab wah chalati to use piche se dekhane ko mai aatur rahata tha. mote mote tarabujom jaise nitamb aur bad.e swaabhaawik tarike se laharaate hue; mujhe lagata tha ki wahi mom ke piche baith jaaum aur apana chehara unake bich chupa dum.


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"kyom pair chuta hai re mere, mai kya tere naani hum. bamd kar de." wah aksar jhallaati par mai baaj nahi aata tha. man me kahata

"mami, tu naaraaj na ho to mai to tere paamv chuma lum." es di barman ka ek gaana mujhe yaad aataa, mom ke charanaamrut ke baare me "... ye charan tere maam, devata pyaala liye, tarase khad.e maam!" us gaane me mom ke prati bhakti hai par mere man me yaha gaana mithe naajaayaj khayaal ubhaar deta.

kama se kama yaha achcha tha ki ab mom mujhe pyaar se apani baamhom me nahi bharati thi jaisa wah bachapan me karati thi. mai bad.a ho gaya tha. yaha achcha hi tha kyomki ab mom ko dekhakar mai uttejit hone laga tha. jab wah ghar ka kaama karati aur usaka dhyaan meri or nahi hota tab mai use man bhar kar ghurata. mera lund tannaakar khad.a ho jaata tha. kabhi usake sumdar chehare aur rasile homthom ko dekhataa, kabhi usake nitambom ko aur kabhi usaki pith aur kamar par najar gad.aaye rahata. usake saamane kisi taraha se mai kamtrol kar leta tha par mauka mile to thik se ghur kar mai usaki maadak sumdarata ka man hi man paan karate hue apane lund par haath rakhakar sahalaane lagata.

kabhi mom sofe par baithakar saamane ki seti par pair rakh kar tivi dekhati ya kuch padh.ati to mera man jhuma uthata kyomki aksar usaka gaaun sarakakar upar ho jaata aur usake gore pair aur maamsal chikani pimdaliyaam dikhane lagatim. mai bhi wahi ek kitaab lekar baith jaata aur usake piche se unhe dekhata rahata aur ek haath se apana lund sahalaata.

aksar mom pair par pair rakhakar ek pair hilaati, to usaki umgaliyom se lataki chappal hilane lagati. yaha dekhakar to mai aur madahosh ho jaata. pahale hi mai usake pairom aur chappalom ka diwaana thaa, fir wah pair se latakakar naachati rabar ki mulaayama chappal dekhakar mujhe lagata tha ki abhi use haath me le lum aur chuma lum, chaba chaba kar kha jaaum. ek baar mom ne mujhe apane pair ki or ghurate hue dekh liya thaa, turamt pair hilaana bamd karake dekhane lagi ki kuch laga hai kyaa, maimne baat bana di ki mom shaayad ek kid.a chadh.a thaa, use dekh raha tha.

mom ko pasina bhi jyaada aata tha. usake blaauz ki kaamkh bhigi rahati thi. wah najaara bhi mujhe bahut uttejit karata tha. kai baar maimne koshish ki ki kapad.e badalate samaya use dekhu. par wah hamesha apane bedaruma me darawaaja lagaakar hi kapad.e badalati. sochati hogi ki ab beta bad.a ho gaya hai.
mai ghar ke kaama karane me usaki khub madad karataa, jo wah kahati turamt bhaag kar karata. wah bhi mujh par khush thi. mai pareshaan thaa, aakhir kya karum, kuch samajh nahi pa raha tha. bich bich me lagata ki mom ke baare me aisa sochana paap hai par usake maadak aakarshan ke aage mai vivash ho gaya tha. mai aksar yaha bhi sochata ki mom jaisi sumdar naari aakhir akele kaise rahati hai, kya use kabhi seks ki chaahat nahi hoti? kya usaka koi afeyar hai? lagata to nahi tha kyomki bechaari aafis se aati to thaki hui. use samaya hi kahaam tha kuch karane ke liye. aur ghar me bhi ab wah akeli nahi thi, mai jo tha.

raat ko aur din me bhi akele me (kaalej khulane me abhi samaya thaa, edamishan bhi nahi hue the) usake rup ko aamkhom ke saamane ko laakar mai hastamaithun karataa, kalpana karata ki mom nagnaawastha me kaisi lagegi. man hi man apani faimtasi me usase taraha taraha ki rati karata. mom ko mai achcha lagata hum aur wah bad.e adhikaar se mujhase man chaahe sambhog kara rahi hai, yaha meri pet faimtasi thi.

ab hausala karake maimne usake amtarwastra churaane shuru kar diye the. usaki bra aur paimti mai chupachaap utha laata aur akele me ghar me uname lund lapet kar muththa maarata. mom ke paas bad.a achcha kalekshan tha. uname se ek les waali safed bra aur ek naayalaan ki kaali bra meri khaas pasamd ki thim. unhe sumghate hue mujhe aisa lagata jaise mai mom ke aagosh me usaki chaati me sir chupaaye pad.a hua hum. lund par unaka mulaayama sparsh mujhe diwaana kar deta.

ek do baar mai pakad.a jaata par bach gaya. aksar muththa maarane se mera wirya uname lag jaata. tab mai dho kar din me unhe sukha kar waapas rakh deta. ek din subaha mom pareshaan lagi. maimne pucha to boli ki usaki kaali bra nahi mil rahi hai. wah kaali saadi pahan kar aafis jaana chaahati thi. aakhir jhalla kar dusari saad.i pahan kar chali gayi. bra milati kaise, raat ko muththa maar kar maimne us bresiyar ko apane kamare me chupa diya tha. mujhe kya maaluma ki aaj wah use hi pahanegi! mom ke jaane ke baad use dhokar sukhaakar maimne mom ki almaari me saad.iyom ke bich chupa diya. baal baal bacha kyomki raat ko waapas aakar mom ne saari almaari dhumdhana shuru kar di. jab bra mili to wah nishchimt hui. boli

"anil, maimne bhi dekho kahaam rakh di thi, isiliye nahi mil rahi thi, mujhe laga tha ki gum to nahi gayi ya baahar gailari se sukhate samay gir to nahi gayi."
usake baad maimne usaki almaari se bra churaana bamd kar diya. mom ke jaane ke baad dhone ko daali usaki bra aur paimti se kaama chalaane laga. yaha aur bhi matawaala kaama tha. uname mom ke sharir ki aur usake pasine ki bhini khushabu chupi hoti. usaki paimti ke kraach me se mom ki chut ki matawaali mahak aati. ab to mai mast hokar unhe mumha me bhar leta aur kas kar muththa maarata. fir kaamawaali baai aane ke pahale unhe dhone ko rakh deta. meri dopahar to ramgin ho gayi par raat ko pareshaani honi lagi.

raat ki pareshaani dur karane ke liye maimne mom ki chappalom ka sahaara lena shuru kar diya. jaisa maimne bataayaa, mom ke pair bad.e khubasurat haim. usake paas saat aath jod.i chappale aur saimdal bhi haim, adhikatar haai hil ki. raat ko mai mom ke so jaane ke baad baahar ke shoo-raik se chupachaap ek jodi utha laata. fir unhe lund se sahalaataa, chumataa, chaatata aur muththa maarata. agar wirya saimdal par chalak jaata to thik se pomch kar waapas rakh deta. waise sabase achchi mujhe mom ki rabar ki baatharuma slipar lagati thi. naajuk si gulaabi wah chappal jab mom ke pairom me dekhata aur chalate samaya hone waali sapaak sapaak ki aawaaj sunata jo mom ke talawom se chappal ke takaraane se hoti thi to mai apana samyama khone lagata tha. dopahar ko wah chappal mai le aata tha par raat ko mom use pahane hoti aur sone ke baad usake bedaruma se unhe uthaane ka mera saahas nahi tha.

isi chakkar me ek din akhir mai pakad.a gaya. ek hisaab se achcha hi hua kyomki us ghatana ne aakhir mom aur mere bich ki saari diwaare hata di












आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj









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