Tuesday, April 13, 2010

सेक्सी कहानियाँ खिलोना पार्ट--4

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खिलोना पार्ट--4

वीरेन्द्रा साक्शेणा का बुंगला 2 मंज़िल था जिसकी उपर की मंज़िल खाली पड़ी हुई थी.नीचे की मंज़िल मे कदम रखते ही 1 बड़ा सा ड्रॉयिंग कम डाइनिंग हॉल था,डाइनिंग टेबल के पीछे लगे शीशे के दरवाज़े से घर के पीछे बना लॉन नज़र आता था.हॉल से बाए मूड 1 छ्होटा गलियारा था जिसके शुरू मे ही किचन था.गलियारा पार करने पे विरेन्द्र जी का कमरा था & उसके साथ वाला कमरा गेस्ट रूम रीमा को दिया गया था.हॉल से दाहिने मुड़ने पे उसी तरह का गलियारा था जिसके अंत मे 3 कमरे थे जिसमे से 1 शेखर का था.

विरेन्द्र जी के कमरे को कमरा ना कह के हॉल कहे तो बेहतर होगा.उस हॉल के 1 कोने मे सुमित्रा जी का बेड लगा था & उसके पास 1 मेज़ & 2 चेर्स रखी थी.1 पर्दे से हॉल को 2 हिस्से मे बाँटा गया था.सुमित्रा जी वाला हिस्सा कमरे की 1 चौथाई जगह मे था,बाकी हिस्से मे बीचो बीच 1 किंग साइज़ बेड था जिसके बगल मे 1 आराम कुर्सी लगी थी.उस बेड की दूसरी ओर 1 वॉल कॅबिनेट था जिसमे 1 टीवी,द्वड प्लेयर,म्यूज़िक सिस्टम & कुच्छ सजावट की चीज़े रखी थी.

रीमा को यहा आए 15 दिन हो गये थे & दर्शन से उसकी अच्छी बनने लगी थी,"बेटी,वो पिच्छली नर्स थी ना,या तो फोन पे लगी रहती थी या फिल्मी किताबें पढ़ती रहती थी,मालकिन की देख-भाल तो जैसे बस नाम के लिए करती थी,इसीलिए जब तुम आई तो मैने सोचा कि तुम भी उसी के जैसी होगी.पर मैं कितना ग़लत था."

रीमा किचन मे दर्शन के साथ लगी कुच्छ बना रही थी.सुमित्रा जी को डॉक्टर ने 1 डाइयेट चार्ट दिया था जिसे आज तक सब लोग आँख मुंडे फॉलो करते चले आ रहे थे.इधर वो बहुत कम खाने लगी थी & रीमा समझ गयी थी कि उन्हे रोज़ वही खाना खा के उकताहट हो गयी है सो उसने आज उनके लिए कुच्छ अलग बनाने की सोची.

बॅंगलुर से आने के बाद जब रीमा का पहली बार अपनी सास से सामना हुआ तो उनकी आँखो से आँसू झरने लगे थे पर ज़ुबान वैसे ही खामोश रही.रीमा की भी आँखे भर आई थी.जब पास जा के उनके सर पे हाथ फेरते हुए वो उनके गले लगी तब जा के उन्हे थोडा सुकून मिला.

"ये तो तैय्यार हो गया,दद्दा.मैं मा जी को खिलाके आती हू,फिर हम दोनो साथ मे खाएँगे."

"ठीक है,बिटिया."

दोपहर के 2:30 बज रहे थे.विरेंड्रा जी रोज़ 2 बजे दफ़्तर से घर लंच के लिए आते थे.रीमा जानबूझ कर इस वक़्त अपनी सास के कामो मे लगी रहती ताकि अपने ससुर से उसका सामना ना हो.वो उस के साथ ऐसे पेश आते थे जैसे की वो है ही नही.शायद ही कभी वो उस से बात करते थे,अगर ज़रूरत पड़ती तो दर्शन के ज़रिए कहलवाते.

सास को खिलाते हुए रीमा के कानो मे डाइनिंग एरिया मे हो रही बातचीत की आवाज़ आ रही थी.

"वाह,दर्शन आज तो सब्ज़ी बड़ी अच्छी बनाई है."

"ये दाद रीमा बेटी को दीजिए,मालिक.उसी ने बनाई है."

उस के बाद खामोशी छा गयी.

थोड़ी देर बाद विरेन्द्र जी कमरे मे दाखिल हुए,"आज तुमने भी खाना बनाया था?"

"जी.",रीमा ने 1 चम्मच अपनी सास के मुँह मे दिया.

"तुम सुमित्रा की नर्स हो & वही रहो तो अच्छा है,उसकी बहू बनाने की कोशिश नही करो."

गुस्से से रीमा का चेहरा तमतमा गया पर जब तक वो कुच्छ जवाब देती उसके ससुर बाहर चले गये थे.

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उसी रात शेखर आया.आते ही उसने दर्शन के पैर छुए,"जीते रहो,भाय्या.अगर इस बार भी 2 दीनो के लिए आए हो तो किसी होटेल मे चले जाओ."

"नही दद्दा,इस बार तो 20 दीनो के लिए आया हू,पर बीच-2 मे शहर से बाहर जाना पड़ेगा.",शेखर हंसा.

"फिर ठीक है.",दर्शन भी हंसता हुआ उसका समान उठाने लगा.

उसी वक़्त रीमा अपने कमरे से निकल हॉल मे पहुँची तो शेखर को देख ठिठक गयी,"नमस्ते.'

"आओ बेटी,यही शेखर भाय्या हैं,मालिक के बड़े लड़के...और ये रीमा बेटी है,भाय्या.मालकिन की नयी नर्स.",दर्शन समान लेकर उसके कमरे को चला गया.शेखर ने सवालिया निगाहो से रीमा को देखा.

"कैसी हो,रीमा?"

"ठीक हू."

"ह्म्म.पिताजी कमरे मे हैं?"

"जी."

शेखर उनसे मिलने उनके कमरे की ओर चल दिया.थोड़ी देर बाद रीमा सुमित्रा जी की दवा ले उनके कमरे मे जा रही थी कि दरवाज़े के बाहर बाप-बेटे की बातचीत सुन उसके कदम वही के वही रुक गये.दोनो उसके बारे मे बात कर रहे थे.

"..तो वो यह बस 1 नर्स की हैसियत से है & मैं चाहता हू कि तुम भी उसे वही समझो...",विरेन्द्र जी की भारी,गंभीर आवाज़ सुनाई दी.

"आप & आपकी बातें च्छुपाने की आदत!",उसकी हँसी मे अपने पिता के लिए अपमान था.

"शेखर!"

"मुझे तो लगता है कि बेचारा रवि भी आपकी किसी च्छुपाई हुई बात का ही तो शिकार नही हो गया."

"क्या बकवास कर रहे हो?!होश मे रहो."

"होश ही मे हू.आप चिंता ना करें,मैं आपका कोई भी राज़ कही नही खोलूँगा."

रीमा तेज़ी से घूम अपने कमरे मे चली गयी.शेखर भी अपने पिता के कमरे से निकल अपने कमरे मे चला गया.

रीमा के मन मे हलचल मच गयी...क्या उसके ससुर का कोई राज़ था?क्या उसी की वजह से रवि की मौत हुई?आख़िर ऐसा क्यू कहा शेखर ने?...फिर विरेन्द्र जी ने रवि के गबन किए हुए 4 लाख रुपये इतनी आसानी से क्यू दे दिए?..उन्होने रवि की इस हरकत का कारण जानने की कोशिश क्यू नही की?...उसने सोचा था कि पैसे देने के बावजूद इस मामले की तहकीकात करेंगे पर बॅंगलुर से लौट के उन्होने इस बारे मे कुच्छ नही किया था.रीमा सोच मे पड़ गयी,उसे लग रहा था कि बस उठे & अपने ससुर & जेठ के सामने सवालो की झड़ी लगा दे.पर अगर वो जवाब देने को तैय्यार भी हो गये तो वो उस से सच बोलेंगे इस बात की क्या गॅरेंटी है...कोई दूसरा तरीका सोचना होगा उसे.उसका दिमाग़ इस के लिए तरकीब ढूँढने मे लग गया & वो दवा ले अपनी सास के पास चली गयी.

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"चलिए ना,दद्दा!मा जी का भी दिल बहल जाएगा.फिर इसी कॉलोनी के पार्क मे तो जाना है.",रीमा दर्शन से कह रही थी,"..फिर अभी 4 ही तो बजे हैं."

"हा...वैसे तो मालिक & भाय्या & के पहले घर नही आएँगे."

"इसीलिए तो कह रही हू.बस 1/2 घंटे मे आ जाएँगे."

"अच्छा चलो."

रीमा दर्शन को सुमित्रा जी को बगल के पार्क मे सैर कराने ले जाने के लिए कह रही थी.उसका मानना था कि बाहर खुले मे घूम उसकी सास को अच्छा लगेगा,उसने उनके डॉक्टर से फोन पे इस बारे मे भी पूच्छ लिया था.

दर्शन की मदद से उसने उन्हे व्हील्चैर मे बिठाया & तीनो घर मे ताला लगा पार्क मे चले गये.जब लौटे तो देखा कि विरेन्द्र जी के घर के बाहर खड़े हैं.दर्शन ने भागते हुए ताला खोला & सब अंदर दाखिल हुए.विरेन्द्र जी ने अभी तक 1 लफ्ज़ भी नही बोला था.

शाम को जब दर्शन बाज़ार गया तो विरेन्द्र जी ने हॉल मे रीमा से कहा,"मैने तुम्हे पहले भी कहा है कि नर्स ही रहो,बहू बनने की कोशिश ना करो.आख़िर किस हैसियत से तुम सुमित्रा को बाहर ले गयी थी?उसे कहीं कुच्छ हो जाता.मैं साफ-2 कहे देता हू,अपनी ऐकात मत भूलो.समझी!अपनी हद..-"

"बहुत हो गया!जब से आई हू तब से आपका रवैयय्या देख रही हू.मैं मा जी को डॉक्टर साहब की इजाज़त से बाहर ले गयी थी...आख़िर मेरी ग़लती क्या है?यही ना कि मैने आपके बेटे से प्यार किया था.तो कोई गुनाह किया क्या?",रीमा के सब्र का बाँध टूट गया.

"हा,किया तुमने गुनाह.तुम नही होती तो वो आज यहा होता ,ज़िंदा."

"आप ग़लत कह रहे हैं,मिस्टर.साक्शेणा.याद कीजिए आपका बेटा आपके पास आया था आपके साथ रहने के लिए.पर आपकी ज़िद के चलते उसे जाना पड़ा.अगर उसकी मौत का कोई ज़िम्मेदार है तो वो है आपकी ज़िद!मैं अनाथ हू,जितना मैं परिवार की अहमियत समझती हू,उतना कोई नही समझ सकता,मैने रवि को बार-2 आपसे सुलह करने को कहा था पर वो भी आपकी तरह ज़िद्दी था.",रीमा अपने दिल का पूरा गुबार निकाल देना चाहती थी,"..मैं यहा केवल मा जी के लिए आई थी.हा ये सच है कि आप नही आते तो मुझे रवि की ग़लती का खामियाज़ा भुगतना पड़ता..उसके लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करती हू.पर मुझे अब इस घर मे और ज़लील नही होना है.आप मा जी के लिए किसी दूसरी नर्स का इंतेज़ाम कर लीजिए...जब वो आ जाएगी तो मैं यहा से चली जाऊंगी & आपके दिल को भी चैन पड़ेगा.",रीमा का गला भर आया & आँखे छल्छला आईं तो वो भाग के अपने कमरे मे चली गयी & तकिये मे मुँह च्छूपा रोने लगी.

उस रात उसने खाना भी नही खाया,दर्शन पुच्छने आया तो उसने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया.दूसरे दिन सवेरे दरवाज़े पे दस्तक हुई तो उसकी आँख खुली,उसने दरवाज़ा खोल तो सामने विरेन्द्र जी को खड़ा पाया.

वो अंदर आ गये.थोड़ी देर तक 1 असहज सी खामोशी कमरे मे पसरी रही,फिर विरेन्द्र जी की वज़नदार आवाज़ ने उसे तोड़ा,"रीमा.."

पहली बार उसने अपने ससुर के मुँह से अपना नाम सुना.

"हमे..हमे माफ़ कर दो.कल तुमने जो भी कहा वो बिल्कुल सच था.अगर रवि की मौत का कोई ज़िम्मेदार है तो वो मैं हू.अगर मैं ज़िद ना करता तो शायद वो हुमारे बीच इस घर मे होता.इंसान का दिल बड़ी अजीब चीज़ है,रीमा.ग़लती मेरी थी पर उसे मानने के बजाय मेरे दिल ने तुम्हे गुनहगार बना दिया & तुमसे नफ़रत करने लगा."

वो अपनी बहू के सामने खड़े हो गये."अगर कर सकती हो तो मुझे माफ़ कर देना,रीमा.मैने तुम्हारे साथ बहुत ज़्यादती की है.हाथ जोड़ कर तुमसे 1 गुज़ारिश करता हू,तुम हमे छ्चोड़ कर मत जाओ.जबसे तुम आई हो,सुमित्रा के चेहरे पे 1 सुकून दिखता है जो पहले कभी नही दिखा.घर मे जैसे...जैसे फिर से थोड़ी सी ही सही रौनक जैसी आ गयी है."

अपने ससुर को हाथ जोड़े उस से विनती करते देख उसे अपने उपर शर्म आ गयी,कल शाम शायद वो कुच्छ ज़्यादा बोल गयी,"पिता जी,ये आप क्या कर रहे हैं!",उसने उनके जुड़े हाथो को पकड़ लिया,"माफी तो मुझे माँगनी चाहिए कल शाम मैने भी बहुत तल्खी से बात की."

"पर उसका ज़िम्मेदार भी तो मैं ही था ना."

"आप बड़े हैं,आपका हक़ है पिता जी."

"ओह्ह,रीमा.कितना ग़लत समझा मैने तुम्हे.",उन्होने ने उसे अपने गले से लगा लिया.विरेन्द्र जी 6'2" कद के लंबे चौड़े शख्स था.उन्होने तो जज़्बाती हो उसे गले लगाया था पर उनके चौड़े सीने मे मुँह च्छूपाते हुए रीमा के बदन मे सनसनी दौड़ गई.उसे जैसे वाहा बहुत सुरक्षा का एहसास हुआ,दिल किया की बस ऐसे ही हमेशा खड़ी रहे.पर फिर उसे अपने उपर शर्म आई,अपने ससुर के बारे मे वो ये कैसी बातें सोच रही थी!

विरेन्द्र जी ने उसे अपने से अलग किया,"हम आज ही सबको बता देंगे की तुम असल मे रवि की पत्नी हो."

"नही.ऐसा मत कीजिए."

"पर क्यू?"

"लोग बातें करेंगे,पिताजी की आख़िर इतने दीनो तक आपने सबसे मुझे नर्स के रूप मे क्यू मिलवाया?खमखा हमारे परिवार के बारे मे उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिलेंगी."

"पर रीमा..-"

"प्लीज़,पिताजी.मेरी बात मान लीजिए & जैसे चल रहा है चलने दीजिए.आगे भगवान हमे कोई रास्ता ज़रूर दिखाएँगे."

"ठीक है.तुम कहती हो तो मान लेता हू.पर मेरी 1 बात तुम्हे भी माननी पड़ेगी."

"बोलिए ना."

"तुम अब हमसे दूर जाने की बात दिल मे भी नही सोचोगी & रोज़ खाने मे कुच्छ ना कुच्छ बनाओगी."

रीमा के होटो पे मुस्कान फैल गयी,"ठीक है.",विरेन्द्र जी भी हंस के चले गये.आज पहली बार उसने उन्हे हंसते देखा था,लगा जैसे कोई दूसरा इंसान ही उनकी जगह आ गया.

उस दिन से तो घर का माहौल ही बदल गया.रीमा ने भी अपने ससुर का 1 नया रूप देखा.वो उसका बहुत ख़याल रखने लगे थे.वो भी अपनी सास के साथ-2 उनका ध्यान रखने लगी थी.अब तो शाम को दफ़्तर से लौट कर वो बस उस से ही बातें करते रहते थे.जहा हर वक़्त सन्नत पसरा रहता था वाहा अब हँसी की आवाज़े सुनाई देने लगी थी.पर रीमा के मन के 1 कोने मे रवि की मौत की गुत्थी सुलझाने की बात भी थी.वो बस सही मौका तलाश रही थी,अपने ससुर से इस बारे मे बात करने का.

1 बात और भी उसे खटक रही थी.उसके ससुर उतने बुरे नही थे जितना उसने पहले सोचा था.दर्शन तो उनकी बड़ाई करते नही थकता था.बाज़ार-मोहल्ले मे भी सबके मुँह से वो उनके लिए बस तारीफ ही सुनती,फिर आख़िर शेखर उनसे क्यू उखड़ा-2 रहता था?

शेखर उसे 1 सुलझा हुआ इंसान लगा था पर अपने पिता से क्यू उसकी बनती नही थी,ये बात उसकी समझ मे नही आ रही थी.

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उस रोज़ वो अपनी सास को दवा पीला रही थी,परदा खुला हुआ था & रूम के दूसरे हिस्से मे विरेन्द्र जी उसकी तरफ मुँह कर आराम कुर्सी पे बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे.सास को दवा पिलाने के बाद उनका बिस्तर ठीक करते वक़्त उसका पल्लू उसके सीने से सरक गया तो उसने भी बेपरवाही से उसे नीचे अपनी सास के बगल मे बिस्तर पे रख दिया.अब उसका ब्लाउस-जिसमे से उसकी चूचियो का 1 बड़ा हिस्सा झाँक आ रहा था & उसका गोरा,सपाट पेट जिसके बीचोबीच उसकी गहरी नाभि पे वो सोने का रिंग चमक रहा था-सॉफ दिख रहा था.

काम करते हुए उसने देखा की उसके ससुर किताब की ओट से उसे देख रहे हैं तो उसे अपनी हालत का ध्यान आया.शर्म से उसके गाल लाल हो गये,उसने धीरे से अपना पल्लू उठा अपने सीने पे रख लिया.काम ख़त्म कर वो बिना उनकी तरफ देखे कमरे से बाहर निकल आई.

उस दिन उसने गौर किया कि उसके ससुर जब भी मौका मिलता उसकी नज़र बचा के उसके बदन को नज़र भर देख रहे हैं.उसे शर्म भी आई पर दिल के किसी कोने मे अच्छा भी लगा-आख़िर इस दुनिया की ऐसी कौन सी लड़की है जो अपने हुस्न की तारीफ,खामोश तारीफ ही सही,नही पसंद करती.

रात के खाने के बाद काम ख़त्म कर वो छत पे टहलने चली गयी,अक्सर वो ऐसा करती थी.इस वक़्त चलने वाली ठंडी हवा उसे बहुत अच्छी लगती थी.पर उस दिन छत पे वो अकेली नही थी.वाहा शेखर भी खड़ा सिगरेट पी रहा था.

"सॉरी,मुझे पता नही था कि आप भी यहा हैं."

"कोई बात नही,रीमा.मैं तो बस इसके लिए आया था.",उसने सिगरेट फेंक अपने जूते से टोट को मसल दिया.

थोड़ी देर की खामोशी के बाद शेखर बोला,"रीमा...मैं पिता जी के रवैयययए के लिए तुमसे माफी माँगता हू."

"जी,कैसा रवैयय्या?"

"वही जो वो तुम्हे बहू नही केवल नर्स मानते हैं."

"ओह..वो.",रीमा तो अपने ससुर की माफी के बाद ये बात तो भूल ही गयी थी.

"आप माफी माँग के मुझे शर्मिंदा ना करे,भाय्या.वैसे सब कुच्छ ठीक ही चल रहा है."

"फिर भी.पिता जी ये ठीक नही कर रहे हैं."

"छ्चोड़िए ना.आप मीना भाभी को क्यू नही लाए?इसी बहाने उनसे भी मिल लेती.रवि उनकी बहुत तारीफ करता था."

"तुम्हे नही पता."

"क्या?"

"मीना & मेरा तलाक़ हो चुका है?"

"क्या?ई..आइ'एम सॉरी."

"प्लीज़ डॉन'ट बी.आइ'एम नोट."

रीमा के लिए 1 चौंकाने वाली खबर थी.वो अपने ख़यालो मे डूबी थी कि उसने देखा कि उसका पल्लू उसकी चूचियो के बीच आ गया है & उसकी दाई चुचि की ब्लाउस मे कसी गोलाई & थोडा सा क्लीवेज सॉफ दिख रहा है & उसके जेठ की नज़रे इस नज़ारे का पूरा लुत्फ़ उठा रही हैं.

"अच्छा,मैं चलती हू.नींद आ रही है,गुड नाइट,भैया!"

"गुड नाइट रीमा."

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रात को रीमा कपड़े बदलते वक़्त अपने ससुर & जेठ की निगाहो की गुस्ताख़ी याद कर रही थी.उसकी चूत मे फिर से वही पुरानी हलचल होने लगी.उसने अपने कपड़े उतार दिए & नंगी बिस्तर पे लेट गयी.उसके ससुर ने तो उसकी ब्लाउस मे बंद छातियो की पूरी गोलाई देखी थी & उसका पेट भी...हाई राम!उन्होने इसे भी देख लिया.उसने अपनी नेवेल रिंग से खेलते हुए सोचा तो उसे शर्म भी आई & हँसी भी & हाथ अपनेआप सरक के चूत पे चला गया.

वो पलंग पे पेट के बल लेट अपनी छातिया बिस्तर पे रगड़ती हुई अपने चूत के दाने को रगड़ने लगी & तभी जैसे उसके दिमाग़ मे रोशनी सी कोंधी.अपने सवालो का सही जवाब पाने का तरीका उसे मिल गया था-उसका बदन.

मर्द की सबसे बड़ी कमज़ोरी है औरत का जिस्म & अपने इसी जिस्म का इस्तेमाल वो अपने ससुर & जेठ से अपने मन की उलझानो को दूर करने के लिए करेगी.वो सोचेंगे कि वो उनका खिलोना है पर हक़ीक़त मे वो उनके साथ खेलेगी & रवि की मौत & उसके पैसे गबन करने का राज़ जानेगी.

"ऊओह.....आआ...हह.....!",अरसे बाद उसे फिर से अपने औरत होने का एहसास हुआ था.आह भरती हुई वो झाड़ गयी पर इस बार रवि नही,पता नही क्यू & कैसे,पानी छ्चोड़ते वक़्त उसके ज़हन मे यही ख़याल आया कि उसके साथ-2 उसके ससुर उसकी चूत मे झाड़ रहे हैं.





KHILONA paart--4

Virendra Saxena ka bungla 2 manzil tha jiski upar ki manzil khali padi hui thi.neeche ki manzil me kadam rakhte hi 1 bada sa drawing cum dining hall tha,dining table ke peechhe lage sheeshe ke darwaze se ghar ke peechhe bana lawn nazar aata tha.hall se baye mud 1 chhota galiyara tha jiske shuru me hi kitchen tha.galiyara paar karne pe virendra ji ka kamra tha & uske sath wala kamra guest room Reema ko diya gaya tha.hall se dahine mudne pe usi tarah ka galiyara tha jiske ant me 3 kamre the jisme se 1 shekhar ka tha.

virendra ji ke kamre ko kamra na kah ke hall kahe to behtar hoga.us hall ke 1 kone me Sumitra ji ka bed laga tha & uske paas 1 mez & 2 chairs rakhi thi.1 parde se hall ko 2 hisse me baanta gaya tha.sumitra ji wala hissa kamre ki 1 chauthai jagah me tha,baki hisse me beecho beech 1 king size bed tha jiske bagal me 1 aaram kursi lagi thi.us bed ki doosri or 1 wall cabinet tha jisme 1 tv,dvd player,music system & kuchh sajawat ki cheeze rakhi thi.

reema ko yaha aaye 15 din ho gaye the & darshan se uski achhi banane lagi thi,"beti,vo pichhli nurse thi na,ya to phone pe lagi rahti thi ya filmi kitaaben padhti tehti thi,malkin ki dekh-bhal to jaise bas naam ke liye karti thi,isiliye jab tum aayi to maine socha ki tum bhi usi ke jaisi hogi.par main kitna galat tha."

reema kitchen me darshan ke sath lagi kuchh bana rahi thi.sumitra ji ko doctor ne 1 diet chart diya tha jise aaj tak sab log aankh munde follow karte chale a rahe the.idhar vo bahut kam khan lagi thi & reema samajh gayi thi ki unhe roz vahi khana kha ke uktahat ho gayi hai so usne aaj unke liye kuchh alag banane ki sochi.

bangalore se aane ke baad jab reema ka pehli baar apni saas se samna hua to unki aankho se aansoo jharne lage the par zuban vaise hi khamosh rahi.reema ki bhi aankhe bhar aayi thi.jab paas jaa ke unke sar pe hath ferte hue vo unke gale lagi tab ja ke unhe thoda sukun mila.

"ye to taiyyar ho gaya,dadda.main maa ji ko khilake aati hu,fir hum dono sath me khayenge."

"thik hai,bitiya."

dopahar ke 2:30 baj rahe the.virendra ji roz 2 baje daftar se ghar lunch ke liye aate the.reema jaanbujh kar is waqt apni saas ke kaamo me lagi rehti taki apne sasur se uska saamna na ho.vo us ke sath aise pesh aate the jaise ki vo hai hi nahi.shayad hi kabhi vo us se baat karte the,agar zarurat padti to darshan ke zariye kehalwate.

saas ko khilate hue reema ke kano me dining area me ho rahi baatcheet ki aavaz aa rahi thi.

"vaah,darshan aaj to sabzi badi achhi banayi hai."

"ye daad reema beti ko dijiye,malik.usi ne banayi hai."

us ke baad khamoshi chha gayi.

thodi der baad virendra ji kamre me dakhil hue,"aaj tumne bhi khana banaya tha?"

"ji.",reema ne 1 chmcha apni saas ke munh me diya.

"tum sumitra ki nurse ho & vahi raho to achha hai,uski bahu banane ki koshish nahi karo."

gusse se reema ka chehra tamtama gaya par jab tak vo kuchh jawab deti uske sasur bahar chale gaye the.

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usi raat Shekhar aaya.aate hi usne darshan ke pair chhue,"jeete raho,bhaiyya.agar is baar bhi 2 dino ke liye aaye ho to kisi hotel me chale jao."

"nahi dadda,is baar to 20 dino ke liye aaya hu,par beech-2 me shahar se bahar jana padega.",shekhar hansa.

"fir thik hai.",darshan bhi hansta hua uska saman uthane laga.

usi waqt reema apne kamre se nikal hall me pahunchi to shekhar ko dekh thithak gayi,"namaste.'

"aao beti,yehi shekhar bhaiyya hain,malik ke bade ladke...aur ye reema beti hai,bhaiyya.malkin ki nayi nurse.",darshan saman lekar uske kamre ko chala gaya.shekhar ne sawaliya nigaho se reema ko dekha.

"kaisi ho,reema?"

"thik hu."

"hmm.pitaji kamre me hain?"

"ji."

shekhar unse milne unke kamre ki or chal diya.thodi der baad reema sumitra ji ki dawa le unke kamre me ja rahi thi ki darwaze ke bahar baap-bete ki baatchit sun uske kadam wahi ke wahi ruk gaye.dono uske bare me baat kar rahe the.

"..to vo yah bas 1 nurse ki haisiyat se hai & main chahta hu ki tum bhi use vahi samjho...",virendra ji ki bhari,gambhir aavaz sunai di.

"aap & aapki baaten chhupane ki aadat!",uski hansi me apne pita ke liye apman tha.

"shekhar!"

"mujhe to lagta hai ki bechara ravi bhi aapki kisi chhupai hui baat ka hi to shikar nahi ho gaya."

"kya bakwas kar rahe ho?!hosh me raho."

"hosh hi me hu.aap chinta na karen,main aapka koi bhi raaz kahi nahi kholunga."

reema tezi se ghum apne kamre me chali gayi.shekhar bhi apne pita ke kamre se nikal apne kamre me chala gaya.

reema ke man me halchal mach gayi...kya uske sasur ka koi raaz tha?kya usi ki wajah se ravi ki maut hui?aakhir aisa kyu kaha shekhar ne?...phir virendra ji ne ravi ke gaban kiye hue 4 lakh rupaye itni aasani se kyu de diye?..unhone ravi ki is harkat ka karan jaanane ki koshish kyu nahi ki?...usne socha tha ki paise dene ke bawjood is mamle ki tehkikat karenge par bangalore se laut ke unhone is bare me kuchh nahi kiya tha.reema soch me pad gayi,use lag raha tha ki bas uthe & apne sasur & jeth ke samne sawalo ki jhadi laga de.par agar vo jawab dene ko taiyyar bhi ho gaye to vo us se sach bolenge is baat ki kya guarantee hai...koi dusra tareeka sochna hoga use.uska dimagh is ke liye tarkeeb dhundhne me laga gaya & vo dawa le apni saas ke paas chali gayi.

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"chaliye na,dadda!maa ji ka bhi dil bahal jayega.fir isi colony ke park me to jana hai.",reema darshan se kah rahi thi,"..fir abhi 4 hi to baje hain."

"haa...vaise to malik & bhaiyya & ke pehle ghar nahi aayenge."

"isiliye to keh rahi hu.bas 1/2 ghante me aa jayenge."

"achha chalo."

reema darshan ko sumitra ji ko bagal ke park me sair karane le jane ke liye keh rahi thi.uska maanana tha ki bahar khule me ghum uski saas ko achha lagega,usne unke doctor se phone pe is bare me bhi poochh liya tha.

darshan ki madad se usne unhe wheelchair me bithaya & teeno ghar me tala laga park me chale gaye.jab laute to dekha ki virendra ji ke ghar ke bahar khade hain.darshan ne bhagte hue tala khola & sab andar dakhil hue.virendra ji ne abhi tak 1 lafz bhi nahi bola tha.

sham ko jab darshan bazar gay to virendra ji ne hall me reema se kaha,"maine tumhe pehle bhi kaha hai ki nurse hi raho,bahu banane ki koshish na karo.aakhir kis haisiyat se tum sumitra ko bahar le gayi thi?use kahin kuchh ho jata.main saaf-2 kehe deta hu,apni aikaat mat bhulo.samjhi!apni had..-"

"bahut ho gaya!jab se aayi hu tab se aapka ravaiyya dekh rahi hu.main maa ji ko doctor sahab ki ijazat se bahar le gayi thi...aakhir meri galti kya hai?yehi na ki maine aapke bete se pyar kiya tha.to koi gunah kiya kya?",reema ke sabr ka bandh tut gaya.

"haa,kiya tumne gunah.tum nahi hoti to vo aaj yaha hota ,zinda."

"aap galat kah rahe hain,mr.saxena.yaad kijiye aapka beta aapke paas aya tha aapke sath rene ke liye.par aapki zid ke chalte use jana pada.agar uski maut ka koi zimmedar hai to vo hai aapki zid!main anath hu,jitna main parivar ki ahmiyat samajhti hu,utna koi nahi samajh sakta,maine ravi ko baar-2 aapse sulah karne ko kaha tha par vo bhi aapki tarah ziddi tha.",reema apne dil ka pura gubar nikal dena chahti thi,"..main yaha kewal maa ji ke liye aayi thi.haa ye sach hai ki aap nahi aate to mujhe ravi ki galti ka khamiyaza bhugatna padta..uske liye main aapka shukriya ada karti hu.par mujhe ab is ghar me aur zaleel nahi hona hai.aap maa ji ke liye kisi dusri nurse ka intezam kar lijiye...jab vo aa jayegi to main yaha se chali jaoongi & aapke dil ko bhi chain padega.",reema ka gala bhar aaya & aankhe chhalchhala aayin to vo bhag ke apne kamre me chali gayi & takiye me munh chhupa rone lagi.

us raat usne khana bhi nahi khaya,darshan puchhne aya to usne tabiyat kharab hone ka bahana bana diya.dusre din savere darwaze pe dastak hui to uski aankh khuli,usne darvaza khol to samne virendra ji ko khada paya.

vo andar aa gaye.thodi der tak 1 asahaj si khamoshi kamre me pasri rahi,fir virendra ji ki wazandar aavaz ne use toda,"reema.."

pehli baar usne apne sasur ke munh se apna naam suna.

"hume..hume maaf kar do.kal tumne jo bhi kaha vo bilkul sach tha.agar ravi ki maut ka koi zimmedar hai to vo main hu.agar main zid na karta to shayad vo humare beech is ghar me hota.insan ka dil badi ajeeb cheez hai,reema.galti meri thi par use maanane ke bajay mere dil ne tumhe gunahgaar bana diya & tumse nafrat karne laga."

vo apni bahu ke samne khade ho gaye."agar kar sakti ho to mujhe maaf kar dena,reema.maine tumhare sath bahut zyadti ki hai.hath jod kar tumse 1 guzarish karta hu,tum hume chhod kar mat jao.jabse tum aayi ho,sumitra ke chehre pe 1 sukun dikhta hai jo pehle kabhi nahi dikha.ghar me jaise...jaise fir se thodi si hi sahi raunak jaisi aa gayi hai."

apne sasur ko hath jode us se vinti karte dekh use apne upar sharm aa gayi,kal sham shayad vo kuchh zyada bol gayi,"pita ji,ye aap kya kar rahe hain!",usne unke jude haatho ko pakad liya,"mafi to mujhe maangni chahiye kal sham maine bhi bahut talkhi se baat ki."

"par uska zimmedar bhi to mai hi tha na."

"aap bade hain,aapka haq hai pita ji."

"ohh,reema.kitna galat samjha maine tumhe.",unhone ne use apne gale se laga liya.virendra ji 6'2" kad ke lambe chaude shakhs tha.unhone to jazbati ho use gale lagaya tha par unke chaude seene me munh chhupate hue reema ke badan me sansani daud gai.use jaise vaha bahut suraksha ka ehsas hua,dil kiya ki bas aise hi humesha khadi rahe.par fir use apne upar sharm aayi,apne sasur ke bare me vo ye kaisi baaten soch rahi thi!

virendra ji ne use apne se alag kiya,"hum aaj hi sabko bata denge ki tum asal me ravi ki patni ho."

"nahi.aisa mat kijiye."

"par kyu?"

"log baaten karenge,pitaji ki aakhir itne dino tak aapne sabse mujhe nurse ke roop me kyu milwaya?khamakha humare parivar ke bare me ulti-seedhi baaten sunane ko milengi."

"par reema..-"

"please,pitaji.meri baat maan lijiye & jaise chal raha hai chalne dijiye.aage bhagwan hume koi rasta zarur dikhayenge."

"thik hai.tum kahti ho to maan leta hu.par meri 1 baat tumhe bhi maanani padegi."

"boliye na."

"tum ab humse door jane ki baat dil me bhi nahi sochogi & roz khane me kuchh na kuchh banaogi."

reema ke hotho pe muskan fail gayi,"thik hai.",virendra ji bhi hans ke chale gaye.aaj pehli baar usne unhe hanste dekha tha,laga jaise koi dusra insan hi unki jagah aa gaya.

us din se to ghar ka mahaul hi badal gaya.reema ne bhi apne sasur ka 1 naya roop dekha.vo uska bahut khayal rakhne lage the.vo bhi apni saas ke sath-2 unka dhyan rakhne lagi thi.ab to sham ko daftar se laut kar vo bas us se hi baaten karte rehte the.jaha har waqt sannat pasra rahta tha vaha ab hansi ki aavazaen sunai dene lagi thi.par reema ke man ke 1 kone me ravi ki maut ki gutthi suljhane ki baat bhi thi.vo bas sahi mauka talash rahi thi,apne sasur se is bare me baat karne ka.

1 baat aur bhi use khatak rahi thi.uske sasur utne bure nahi the jitna usne pehle socha tha.darshan to unki badayi karte nahi thakta tha.bazar-mohalle me bhi sanke munh se vo unke liye bas tareef hi sunti,fir aakhir shekhar unse kyu ukhra-2 rehta tha?

shekhar use 1 suljha hua insan laga tha par pane pita se kyu uski banti nahi thi,ye baat uski samajh me nahi aa rahi thi.

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us roz vo apni saas ko dawa pila rahi thi,parda khula hua tha & room ke dusre hisse me virendra ji uski taraf munh kar aaram kursi pe baithe koi kitab padh rahe the.saas ko dawa pilane ke baad unka bistar thik karte waqt uska pallu uske seene se sarak gaya to usne bhi beparwahi se use neeche apni saas ke bagal me bistar pe rakh diya.ab uska blouse-jisme se uski chhatiyon ka 1 bada hissa jhank aa raha tha & uska gora,sapat pet jiske beechobeech uski gehri nabhi pe vo sone ka ring chamak raha tha-saaf dikh raha tha.

kaam karte hue usne dekha ki uske sasur kitab ki ot se use dekh rahe hain to use apni halat ka dhyan aaya.sharm se uske gaal laal ho gaye,usne dheere se apna pallu utha apne seene pe rakh liya.kaam khatm kar vo bina unki taraf dekhe kamre se bahar nikal aayi.

us din usne gaur kiya ki uske sasur jab bhi mauka milta uski nazar bacha ke uske badan ko nazar bhar dekh rahe hain.use sharm bhi aayi par dil ke kisi kone me achha bhi laga-aakhir is duniya ki aisi kaun si ladki hai jo apne husn ki tareef,khamosh tareef hi sahi,nahi pasand karti.

raat ke khane ke baad kaam khatm kar vo chhat pe tahalne chali gayi,aksar vo aisa karti thi.is waqt chalne wali thandi hawa use bahut achhi lagti thi.par us din chhat pe vo akeli nahi thi.vaha shekhar bhi khada cigarette pi raha tha.

"sorry,mujhe pata nahi tha ki aap bhi yaha hain."

"koi baat nahi,reema.main to bas iske liye aaya tha.",usne cigarette fenk apne joote se tote ko masal diya.

thodi der ki khamoshi ke baad shekhar bola,"reema...main pita ji ke ravaiyye ke liye tumse mafi maangta hu."

"ji,kaisa ravaiyya?"

"vahi jo vo tumhe bahu nahi kewal nurse maante hain."

"oh..vo.",reema to apne sasur ki mafi ke baad ye baat to bhul hi gayi thi.

"aap mafi maang ke mujhe sharminda na kare,bhaiyya.vaise sab kuchh thik hi chal raha hai."

"phir bhi.pita ji ye thik nahi kar rahe hain."

"chhodiye na.aap meena bhabhi ko kyu nahi laye?isi bahane unse bhi mil leti.ravi unki bahut tareef karta tha."

"tumhe nahi pata."

"kya?"

"meena & mera talaq ho chuka hai?"

"kya?i..i'm sorry."

"please don't be.i'm not."

reema ke liye 1 chaunkane wali khabar thi.vo apne khayalo me dubi thi ki usne dekha ki uska pallu uski choochiyo ke beech aa gaya hai & uski daayi chuchi ki blouse me kasai golai & thoda sa cleavage saaf dikh raha hai & uske jeth ki nazre is nazare ka pura lutf utha rahi hain.

"achha,main chalti hu.neend aa rahi hai,good night,bhaiya!"

"good night reema."

-------------------------------------------------------------------------------

raat ko reema kapde badalte waqt apne sasur & jeth ki nigaho ki gustakhi yaad kar rahi thi.uski chut me fir se vahi purani halchal hone lagi.usne apne kapde utar diye & nangi bistar pe let gayi.uske sasur ne to uski blouse me band chhatiyo ki poori golai dekhi thi & uska pet bhi...hai raam!unhone ise bhi dekh liya.usne apni navel ring se khelte hue socha to use sharm bhi aayi & hansi bhi & hath apneaap sarak ke chut pe chala gaya.

vo palang pe pet ke bal let apni chhatiya bistar pe ragadti hui apne chut ke dane ko ragadne lagi & tabhi jaise uske dimagh me roshni si kondhi.apne sawalo ka sahi jawab pane ka tareeka use mil gaya tha-uska badan.

mard ki sabse badi kamzori hai aurat ka jism & apne isi jism ka istemal vo apne sasur & jeth se apne man ki uljhano ko dur karne ke liye karegi.vo sochenge ki vo unka khilona hai par haqeeqat me vo unke sath khelegi & ravi ki maut & uske paise gaban karne ka raaz jaanegi.

"ooohhhhh.....aaaa...hhhhh.....!",arse baad use fir se apne aurat hone ka ehsas hua tha.aah bharti hui vo jhad gayi par is baar ravi nahi,pata nahi kyu & kaise,pani chhodte waqt uske zehan me yehi khayal aaya ki uske sath-2 uske sasur uski chut me jhad rahe hain.













आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj


































































































































































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